शुक्रवार, 30 सितंबर 2016

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 🌹🔱🔅श्रीमद्भगवद्गीता🔅🔱🌹

🌹श्रीमद्भगवद्गीता :
🌹 साधक-संजीवनी :
🌟 प्रथम अध्याय :

( गत ब्लाग से आगे )

इस कारण अर्जुन में छिपा हुआ कौटुम्बिक ममतायुक्त मोह जाग्रत हो जाए और मोह जाग्रत होने से अर्जुन जिज्ञासु बन जाए, जिससे अर्जुन को निमित्त बनाकर भावी कलियुगी जीवों के कल्याण के लिए गीता का महान उपदेश दिया जा सके- इसी भाव से भगवान ने यहाँ ‘पश्यैतान् समवेतान् कुरून्’ कहा है। नहीं तो भगवान् ‘पश्यैतान् धार्तराष्ट्रान् समानिति’- ऐसा भी कह सकते थे; परंतु ऐसा कहने से अर्जुन के भीतर युद्ध करने का जोश आता; जिससे गीता के प्राकट्य का अवसर ही नहीं आता! और अर्जुन के भीतर का प्रसुप्त कौटुम्बिक मोह भी दूर नहीं होता, जिसको दूर करना भगवान अपनी जिम्मेवारी मानते हैं। जैसे कोई फोड़ा हो जाता है तो वैद्यलोग पहले उसको पकाने की चेष्टा करते हैं और जब वह पक जाता है, तब उसको चीरा देकर साफ कर देते हैं; ऐसे ही भगवान भक्त के भीतर छिपे हुए मोह को पहले जाग्रत करके फिर उसको मिटाते हैं। यहाँ भी भगवान अर्जुन के भीतर छिपे हुए मोह को ‘कुरून् पश्य’ कहकर जाग्रत कर रहे हैं, जिसको आगे उपदेश देकर नष्ट कर देंगे।
अर्जुन कहा था कि ‘इनको मैं देख लूँ’- ‘निरीक्षे’ ‘अवेक्षे’; अतः यहाँ भगवान को ‘पश्य’- ऐसा कहने की जरूरत ही नहीं थी। भगवान को तो केवल रथ खड़ा कर देना चाहिए था। परंतु भगवान ने रथ खड़ा करके अर्जुन के मोह को जाग्रत करने के लिए ही ‘कुरून् पश्य’- ऐसा कहा है।

कौटुम्बिक स्नेह और भगवत्प्रेम- इन दोनों में बहुत अंतर है। कुटुम्ब में ममतायुक्त स्नेह हो जाता है तो कुटुम्ब के अवगुणों की तरफ खयाल जाता ही नहीं; किंतु ‘ये मेरे हैं- ऐसा भाव रहता है। ऐसे ही भगवान का भक्त में विशेष स्नेह हो जाता है तो भक्त के अवगुणों की तरफ भगवान का खयाल जाता ही नहीं; किंतु ‘यह मेरा ही है’- ऐसा ही भाव रहता है। कौटुम्बिक स्नेह में क्रिया तथा पदार्थ की और भगवत्प्रेम में भाव की मुख्यता रहती है। कौटुम्बिक स्नेह में मूढ़ता की और भगवत्प्रेम में आत्मीयता की मुख्यता रहती है। कौटुम्बिक स्नेह में अंधेरा और भगवत्प्रेम में प्रकाश रहता है। कौटुम्बिक स्नेह में मनुष्य कर्तव्यच्युत हो जाता है और भगवत्प्रेम में तल्लीनता के कारण कर्तव्य-पालन में विस्मृति तो हो सकती है, पर भक्त कभी कर्तव्यच्युत नहीं होता। कौटुम्बिक स्नेह में कुटुम्बियों की और भगवत्प्रेम में भगवान की प्रधानता होती है।’

( शेष आगे के ब्लाग में )

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गुरुवार, 22 सितंबर 2016

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🌹 श्रीमद्भगवद्गीता :
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🌹 प्रथम अध्याय :

( गत ब्लाग से आगे )

संबंध- अर्जुन के ऐसा कहने पर भगवान ने क्या किया- इसको संजय आगे के दो श्लोक में कहते हैं।

एवमुक्तो हृषीकेशो गुडाकेशेन भारत ।
सेनयोरुभयोर्मध्ये स्थापयित्वा रतोत्तमम् ।। 24 ।।
भीष्मद्रोणप्रमुखतः सर्वेषां च महीक्षिताम् ।
उवाच पार्थ पश्यैतान्समवेतान्कुरूनिति ।। 25 ।।
अर्थ- संजय बोले- हे भरtवंशी राजन् ! निद्राविजयी अर्जुन के द्वारा इस तरह कहने पर अंतर्यामी भगवान श्रीकृष्ण ने दोनों सेनाओं के मध्य भाग में पितामह भीष्म और आचार्य द्रोण के सामने तथा संपूर्ण राजाओं के सामने श्रेष्ठ रथ को खड़ा करके इस तरह कहा कि ‘हे पार्थ! इन इकट्ठे हुए कुरुवंशियों को देख।’

व्याख्या- ‘गुडाकेशेन’- ‘गुडाकेश’ शब्द के दो अर्थ होते हैं-

‘गुडा’ नाम मुड़े हुए का है और ‘केश’ नाम बालों का है। जिसके सिर के बाल मुड़े हुए अर्थात घुँघराले हैं, उसका नाम ‘गुडाकेश’ है।

‘गुडाका’ नाम निद्रा का है और ‘ईश’ नाम स्वामी का है। जो निद्रा का स्वामी है अर्थात निद्रा ले चाहे न ले- ऐसा जिसका निद्रा पर अधिकार है, उसका नाम ‘गुडाकेश’ है। अर्जुन के केश घुँघराले थे और उनका निद्रा पर आधिपत्य था; अतः उनको ‘गुडाकेश’ कहा गया है।

‘एवमुक्तः’- जो निद्रा- आलस्य के सुख का गुलाम नहीं होता और जो विषय- भोगों का दास नहीं होता, केवल भगवान का ही दास होता है, उस भक्त की बात भगवान सुनते हैं; केवल सुनते ही नहीं, उसकी आज्ञा का पालन भी करते हैं। इसलिए अपने सखा भक्त अर्जुन के द्वारा आज्ञा देने पर अंतर्यामी भगवान श्रीकृष्ण ने दोनों सेनाओं के बीच में अर्जुन का रथ खड़ा कर दिया।

‘हृषीकेशः’- इंद्रियों का नाम ‘हृषीक’ है। जो इंद्रियों के ईश अर्थात स्वामी हैं, उनको हृषीकेश कहते हैं। पहले इक्कीसवें श्लोक में और यहाँ ‘हृषीकेश’ कहने का तात्पर्य है कि जो मन, बुद्धि, इंद्रियाँ आदि सब के प्रेरक हैं, सबको आज्ञा देने वाले हैं, वे ही अंतर्यामी भगवान यहाँ अर्जुन की आज्ञा का पालन करने वाले बन गये हैं! यह उनकी अर्जुन पर कितनी अधिक कृपा है!
‘सेनयोरुभयोर्मध्ये स्थापयित्वा रथोत्तमम्’- दोनों सेनाओं के बीच में जहाँ खाली जगह थी, वहाँ भगवान ने अर्जुन के श्रेष्ठ रथ को खड़ा कर दिया।

‘भीष्मद्रोणमुखतः सर्वेषां च महीक्षिताम्’- उस रथ को भी भगवान ने विलक्षण चतुराई से ऐसी जगह खड़ा किया, जहाँ से अर्जुन को कौटुम्बिक संबंध वाले पितामह भीष्म, विद्या के संबंध वाले आचार्य द्रोण एवं कौरव सेना के मुख्य-मुख्य राजा लोग सामने दिखायी दे सकें।

‘उवाच पार्थ पश्यैतान्समवेतान्कुरुनिति’- ‘कुरु’ पद में धृतराष्ट्र के पुत्र और पांडु के पुत्र- ये दोनों आ जाते हैं; क्योंकि ये दोनों ही कुरुवंशी हैं। युद्ध के लिए एकत्र हुए इन कुरुवंशियों को देख- ऐसा कहने का तात्पर्य है कि इन कुरुवंशियों को देखकर अर्जुन के भीतर यह बाव पैदा हो जाए कि हम सब एक ही तो हैं! इस पक्ष के हों, चाहे उस पक्ष के हों; भले हों, चाहे बुरे हों; सदाचारी हों, चाहे दुराचारी हों; पर हैं सब अपने ही कुटुम्बी।

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मंगलवार, 20 सितंबर 2016

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🌹 श्रीमद्भगवद्गीता :
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🌟 प्रथम अध्याय :

( गत ब्लाग से आगे )

योत्स्यमानानवेक्षेऽहं य एतेऽत्र समागताः ।
धार्तराष्ट्रस्य दुर्बुद्धेर्युद्धे प्रियचिकीर्षवः ।। 23 ।।

अर्थ- दुष्टबुद्धि दुर्योधन का युद्ध में प्रिय करने की इच्छा वाले जो ये राजा लोग इस सेना में आये हुए हैं, युद्ध करने को उतावले हुए इन सबको मैं देख लूँ।

'व्याख्या'- ‘धार्तराष्ट्रस्य दुर्बुद्धेर्युद्धे प्रियचिकीर्षवः’- यहाँ दुर्योधन को दुष्ट बुद्धि कहकर अर्जुन यह बताना चाहते हैं कि इस दुर्योधन ने हमारा नाश करने के लिए आज तक कई तरह के षड्यंत्र रचे हैं। हमें अपमानित करने के ले कई तरह के उद्योग किए हैं। नियम के अनुसार और न्यायपूर्वक हम आधे राज्य के अधिकारी हैं, पर उसको भी यह हड़पना चाहता है, देना नहीं चाहता। ऐसी तो इसकी दुष्टबुद्धि है; और यहाँ आये हुए राजा लोग युद्ध में इसका प्रिय करना चाहते हैं ! वास्तव में तो मित्रों का यह कर्तव्य होता है कि वे ऐसा काम करें, ऐसी बात बताएं, जिससे अपने मित्र का लोक-परलोक में हित हो। परंतु ये राजा लोग दुर्योधन की दुष्टबुद्धि को शुद्ध न करके उलटे उसको बढ़ाना चाहते है और दुर्योधन से युद्ध कराकर, युद्ध में उसकी सहायता करके उसका पतन ही करना चाहते हैं। तात्पर्य है कि दुर्योधन का हित किस बात में है; उसको राज्य भी किस बात से मिलेगा और उसका परलोक भी किस बात से सुधरेगा- इन बातों का वे विचार ही नहीं कर रहे हैं। अगर ये राजा लोग उसको यह सलाह देते कि भाई, कम से कम आधा राज्य तुम रखो और पांडवों का आधा राज्य पांडवों को दे दो तो इससे दुर्योधन का आधा राज्य भी रहता और उसका परलोक भी सुधरता।

‘योत्स्यमानानवेक्षऽहं य एतेऽत्र समागताः’- इन युद्ध के लिए उतावले होने वालों को जरा देख तो लूँ! इन्होंने अधर्म का, अन्याय का पक्ष लिया है, इसलिए ये हमारे सामने टिक नहीं सकेंगे, नष्ट हो जाएंगे।
‘योत्स्यमानान्’ कहने का तात्पर्य है कि इनके मन में युद्ध की ज्यादा आ रही है; अतः देखूँ तो सही कि ये हैं कौन?

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रविवार, 18 सितंबर 2016

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🌹 श्रीमद्भगवद्गीता :
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🌹 प्रथम अध्याय :

( गत ब्लाग से आगे )

हृषीकेशं तदा वाक्यमिदमाह महीपते ।
सेनयोरुभोर्मध्ये रथं स्थापय मेऽच्युत ।। 21 ।।
यावदेतान्निरीक्षऽहं योद्धुकामानवस्थितान् ।
कैर्मया सह योद्धव्यमस्मिन्रणसमुद्यमे ।। 22 ।।

अर्थ- अर्जुन बोले- हे अच्युत ! दोनों सेनाओं के मध्य में मेरे रथ को आप तब तक खड़ा कीजिये, जब तक मैं युद्धक्षेत्र में खड़े हुये इन युद्ध की इच्छा वालों को देख न लूँ कि इस युद्धरूप उद्योग में मुझे किन-किन के साथ युद्ध करना योग्य है।

व्याख्या- ‘अच्युत सेनायोरुभयोर्मध्ये रथं स्थापय’- दोनों सेनाएँ जहाँ युद्ध करने के लिये एक-दूसरे के सामने खड़ी थी, वहाँ उन दोनों सेनाओं में इतनी दूरी थी कि येक सेना दूसरी सेना पर बाण आदि मार सके। उन दोनों सेनाओं का मध्यभाग दो तरफ से मध्य था-
1. सेनाएँ जितनी चौड़ी खड़ी थीं, उस चौड़ाई का मध्यभाग और
2. दोनों सेनाओं का मध्यभाग, जहाँ से कौरव सेना जितनी दूरी पर खड़ी थी, उतनी ही दूरी पर पांडव सेना खड़ी थी। ऐसे मध्य भाग में खड़ा करने के लिये अर्जुन भगवान से कहते हैं, जिससे दोनों सेनाओं को आसानी से देखा जा सके।

‘सेनयोरुभयोर्मध्ये’ पद गीता में तीन बार आया है- यहाँ, इसी अध्याय के चौबीसवें श्लोक में और दूसरे अध्याय में दसवें श्लोक में। तीन बार आने का तात्पर्य है कि पहले अर्जुन शूरवीरता के साथ अपने रथ को दोनों सेनाओं के बीच में खड़ा करने की आज्ञा देते हैं, फिर भगवान दोनों सेनाओं के बीच में रथ को खड़ा करके कुरुवशियों को देखने के लिये कहते हैं। और अंत में दोनों सेनाओं के बीच में ही विषादमग्र अर्जुन को गीता का उपदेश देते हैं। इस प्रकार पहले अर्जुन में शूरवीरता थी, बीच में कुटुम्बियों को देखने से मोह के कारण उनकी युद्ध से उपरति हो गयी और अंत में उनको भगवान द्वारा गीता का महान उपदेश प्राप्त हुआ, जिससे उनका मोह दूर हो गया। इससे यह भाव निकलता है कि मनुष्य जहाँ-कहीं और जिस-किसी परिस्थिति में स्थित है, वहीं रहकर वह प्राप्त परिस्थिति का सदुपयोग करके निष्काम हो सकता है और वहीं उसको परमात्मा की प्राप्ति हो सकती है। कारण कि परमात्मा संपूर्ण परिस्थितियों में सदा येक रूप से रहते हैं।

‘यावदेतान्निरीक्षेऽहं.......रणसमुद्यमे’- दोनों सेनाओं के बीच में रथ कब तक खड़ा करें? इस पर अर्जुन कहते हैं कि युद्ध की इच्छा को लेकर कौरव-सेना में आये हुये सेना सहित जितने भी राजालोग खड़े हैं, उन सबको जब तक मैं देख न लूँ, तब तक आप रथ को वहीं खड़ा रखिये। इस युद्ध के उद्योग में मुझे किन-किन के साथ युद्ध करना है? उनमें कौन मेरे समान बलवाले हैं? कौन मेरे से कम बलवाले हैं? और कौन मेरे से अधिक बलवाले हैं? उन सबको मैं जरा देख लूँ।

यहाँ ‘योद्धुकामान्’ पद से अर्जुन कह रहे हैं कि हमने तो संधि की बात ही सोची थी, पर उन्होंने संधि की बात स्वीकार नहीं की; क्योंकि उनके मन में युद्ध करने की ज्यादा इच्छा है। अतः उनको मैं देखूँ कि कितने बल को लेकर वे युद्ध करने की इच्छा रखते हैं।

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बुधवार, 14 सितंबर 2016

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( गत ब्लाग से आगे )

कविध्वजः- अर्जुन के लिये ‘कपिध्वज’ विशेषण देकर संजय धृतराष्ट्र को अर्जुन के रथ की ध्वजा पर विराजमान हनुमान जी का स्मरण कराते हैं। जब पांडव वन में रहते थे, तब एक दिन अकस्मात वायु ने एक दिव्य सहस्र दल कमल लाकर द्रौपदी के सामने डाल दिया। उसे देखकर द्रौपदी बहुत प्रसन्न हो गयी और उससे भीमसेन से कहा कि ‘वीरवर!’ आप ऐसे बहुत से कमल ला दीजिये। द्रौपदी की इच्छा पूर्ण करने के लिये भीमसेन वहाँ से चल पड़े। जब वे कदलीवन में पहुँचे, तब वहाँ उनकी हनुमान जी से भेंट हो गयी। उन दोनों की आपस में कई बातें हुईं। अंत में हनुमान जी ने भीमसेन से वरदान मांगने के लिए आग्रह किया तो भीमसेन ने कहा कि ‘मेरे पर आपकी कृपा बनी रहे’। इस पर हनुमान जी ने कहा कि ‘हे वायु पुत्र! जिस समय तुम बाण और शक्ति के आघात से व्याकुल शत्रुओं की सेना में घुसकर सिंहनाद करोगे, उस समय मैं अपनी गर्जना से उस सिंहनाद और बढ़ा दूँगा। इसके सिवाय अर्जुन के रथ की ध्वजा पर बैठकर मैं ऐसी भयंकर गर्जना किया करूँगा, जो शत्रुओं को सुगमता से मार सकोगे।’ इस प्रकार जिनके रथ की ध्वजा पर हनुमान जी विराजमान हैं, विजय निश्चित है।
पांडवः- धृतराष्ट्र ने अपने प्रश्न में ‘पांडवाः’ पद का प्रयोग किया था। अतः धृतराष्ट्र को बार-बार पांडवों की याद दिलाने के लिये संजय ‘पांडवः’ शब्द का प्रयोग करते हैं।
हृषीकेशं तदा वाक्यमिदमाह महीपते- पांडव सेना को देखकर दुर्योधन तो गुरु द्रोणाचार्य के पास जाकर चालाकी से भरे हुए वचन बोलता है; परन्तु अर्जुन कौरव सेना को देखकर जो जगद्गुरु अंतर्यामी हैं, मन-बुद्धि आदि के प्रेरक हैं- ऐसे भगवान श्रीकृष्ण से शूरवीरता, उत्साह और अपने कर्तव्य से भरे हुए वचन बोलते हैं।

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सोमवार, 12 सितंबर 2016

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संबंध- धृतराष्ट्र ने पहले श्लोक में अपने और पांडु के पुत्रों के विषय में प्रश्न किया था। उसका उत्तर संजय ने दूसरे श्लोक से उन्नीसवें श्लोक तक दे दिया। अब संजय भगवद्गीता के प्राकट्य का प्रसंग आगे के श्लोक से आरंभ करते हैं।

अथ व्यवस्थितान्दृष्टवा धार्तराष्ट्रान् कपिध्वजः ।
प्रवृत्ते शस्त्रसंपाते धनुरुद्यम्य पांडवः ।। 20 ।।

अर्थ- हे महीपते धृतराष्ट्र! अब शस्त्रों के चलने की तैयारी हो रही थी कि उस समय अन्यायपूर्वक राज्य को धारण करने वाले राजाओं और उनके साथियों को व्यवस्थित रूप से सामने खड़े हुए देखकर कपिध्वज पांडु पुत्र अर्जुन ने अपना गांडीव धनुष उठा लिया और अंतर्यामी भगवान श्रीकृष्ण से ये वचन बोले।

व्याख्या- ‘अथ’- इस पद का तात्पर्य है कि अब संजय भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन के संवादरूप ‘भगवद्गीता’ का आरंभ करते हैं। अठारहवें अध्याय के चौहत्तरवें श्लोक में आए ‘इति’ पद से यह संवाद समाप्त होता है। ऐसे ही भगवद्गीता के उपदेश का आरंभ उसके दूसरे अध्याय के ग्यारहवें श्लोक से होता है और अठारहवें अध्याय के छाछठवें श्लोक में यह उपदेश समाप्त होता है।

प्रवृत्ते शस्त्रसंपाते- यद्यपि पितामह भीष्म ने युद्धारंभ की घोषणा के लिए शंख नहीं बजाया था, प्रत्युत केवल दुर्योधन को प्रसन्न करने के लिए ही शंख बजाया था, तथापि कौरव और पांडवसेना ने उसको युद्धारंभ की घोषणा ही मान लिया और अपने-अपने अस्त्र-शस्त्र हाथ में उठाकर तैयार हो गये। इस तरह सेना को शस्त्र उठाये देखकर वीरता में भरकर अर्जुन ने भी अपना गांडीव धनुष हाथ में उठा लिया।

व्यवस्थितान् धार्तराष्ट्रान् दृष्टा- इन पदों से संजय का तात्पर्य है कि जब आपके पुत्र दुर्योधन ने पांडवों की सेना को देखा, तब वह भागा-भागा द्रोणाचार्य के पास गया। परंतु जब अर्जुन ने कौरवों की सेना को देखा, तब उनका हाथ सीधे गांडीव धनुष पर ही गया- ‘धनुरुद्यम्य’। इससे मालूम होता है कि दुर्योधन के भीतर भय है कि और अर्जुन के भीतर निर्भयता है, उत्साह है, वीरता है।

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शनिवार, 10 सितंबर 2016

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संबंध- पांडव सेना के शंखवादन का कौरव सेना पर क्या असर हुआ- इसको आगे के श्लोक में कहते हैं।

स घोषो धार्तराष्ट्राणां हृदयानि व्यदारयत् ।
नभश्च पृथिवीं चैव तुमुलो व्यनुनायदन् ।। 19 ।।

अर्थ- पांडव सेना के शंखों के उस भयंकर शब्द ने आकाश और पृथ्वी को भी गुँजाते हुए अन्यायपूर्वक राज्य हड़पने वाले दुर्योधन आदि के हृदय विदीर्ण कर दिए।

व्याख्या- ‘स घोषो धार्तराष्ट्राणां.... तुमुलो व्यनुनादयन्’- पांडव-सेना की वह शंख ध्वनि इतनी विशाल, गहरी, ऊँची और भयंकर हुई कि उस से पृथ्वी और आकाश के बीच का भाग गूँज उठा। उस शब्द से अन्यायपूर्वक राज्य को हड़पने वालों के और उनकी सहायता के लिए खड़े हुए राजाओं के हृदय विदीर्ण हो गये। तात्पर्य है कि हृदय को किसी अस्त्र-शस्त्र से विदीर्ण करने से जैसी पीड़ा होती है, वैसी ही पीड़ा उनके हृदय में शंख ध्वनि से हो गयी। उस शंख ध्वनि ने कौरव सेना के हृदय में युद्ध का जो उत्साह था, बल था, उसको कमजोर बना दिया, जिससे उनके हृदय में पांडव-सेना का भय उत्पन्न हो गया। संजय ये बातें धृतराष्ट्र को सुना रहे हैं। धृतराष्ट्र के सामने ही संजय का ‘धृतराष्ट्र के पुत्रों अथवा संबंधियों के हृदय विदीर्ण कर दिये’ ऐसा कहना सभ्यतापूर्ण और युक्तिसंगत नहीं मालूम देता। इसलिए संजय को ‘धार्तराष्ट्राणाम्’ न कहकर ‘तावकीनानाम्’ कहना चाहिए था; क्योंकि ऐसा कहना ही सभ्यता है। इस दृष्टि से यहाँ ‘धार्तराष्ट्राणाम्’ पद का अर्थ ‘जिन्होंने अन्यापूर्वक राज्य को धारण किया’- ऐसा लेना ही युक्तिसंगत तथा सभ्यतापूर्ण मालूम देता है। अन्याय का पक्ष लेने से ही उनके हृदय विदीर्ण हो गए- इन दृष्टि से भी यह अर्थ लेना ही युक्ति संगत मालूम देता है। यहाँ शंका होती है कि कौरवों की ग्यारह अक्षौहिणी सेना के शंख आदि बाजे बजे तो उनके शब्द का पांडव सेना पर कुछ भी असर नहीं हुआ, पर पांडवों की सात अक्षौहिणी सेना के शंख बजे तो उनके शब्द से कौरव सेना के हृदय विदीर्ण क्यों हो गए?
इसका समाधान यह है कि जिनके हृदय में अधर्म, पाप, अन्याय नहीं है अर्थात जो धर्मपूर्वक अपने कर्तव्य का पालन करते हैं, उनका हृदय मजबूत होता है, उनके हृदय में भय नहीं होता। न्याय का पक्ष होने से उनमें उत्साह होता है, शूरवीरता होती है। पांडवों ने वनवास के पहले भी न्याय और धर्मपूर्वक राज्य किया था और वनवास के बाद भी नियम के अनुसार कौरवों से न्यायपूर्वक राज्य मांगा था। अतः उनके हृदय में भय नहीं था, प्रत्युत उत्साह था, शूरवीरता थी। तात्पर्य है कि पांडवों का पक्ष धर्म का था। इस कारण कौरवों की ग्यारह अक्षौहिणी सेना के बाजों के शब्द का पांडव-सेना पर कोई असर नहीं हुआ। परंतु जो अधर्म, पाप, अन्याय आदि करते हैं, उनके हृदय स्वाभाविक ही कमजोर होते हैं. उनके हृदय में निर्भयता, निःशंकता नहीं रहती। उनका खुद का किया पाप, अन्याय ही उनके हृदय को निर्बल बना देता है। अधर्म अधर्मी को खा जाता है। दुर्योधन आदि ने पांडवों को अन्यायपूर्वक मारने का बहुत प्रयास किया था। उन्होंने छल-कपट से अन्यायपूर्वक पांडवों का राज्य छीना था और उनको बहुत कष्ट दिए थे। इस कारण उनके हृदय कमजोर, निर्बल हो चुके थे। तात्पर्य है कि कौरवों का पक्ष अधर्म का था। इसलिए पांडवों की सात अक्षौहिणी सेना की शंख ध्वनि से उनके हृदय विदीर्ण हो गये, उनमें बड़े जोर की पीड़ा हो गयी।

इस प्रसंग से साधक को सावधान हो जाना चाहिये कि उसके द्वारा अपने शरीर, वाणी मन से कभी भी कोई अन्याय और अधर्म का आचरण न हो। अन्याय और अधर्मयुक्त आचरण से मनुष्य का हृदय कमजोर, निर्बल हो जाता है। उसके हृदय में भय पैदा हो जाता है। उदाहरणार्थ, लंकाधिपति रावण से त्रिलोकी डरती थी। वही रावण जब सीता जी का हरण करने जाता है, तब भयभीत होकर इधर-उधर देखता है। इसलिए साधक को चाहिए कि वह अन्याय- अधर्मयुक्त आचरण कभी न करे।

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गुरुवार, 8 सितंबर 2016

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काश्यश्च परमेष्वासः शिखण्डी च महारथः ।
धृष्टद्युम्नो विराटश्च सात्यकिश्चापराजित: ।। 17 ।।
द्रुपदो द्रौपदेयाश्च सर्वशः पृथिवीपते ।
सौभद्रश्च महाबाहुः शंखान्दध्मुः पृथक् पृथक् ।। 18 ।।

अर्थ- हे राजन्! श्रेष्ठ धनुष वाले काशिराज और महारथी शिखंडी तथा धृष्टद्युम्न एवं राजा विराट और अजेय सात्यकि, राजा द्रुपद और द्रौपदी के पाँचों पुत्र तथा लंबी-लंबी भुजाओं वाले सुभद्रा-पुत्र अभिमन्यु- इन सभी ने सब ओर से अलग-अलग शंख बजाए।

व्याख्या- ‘काश्यश्च परमेष्वासः...... शंखान् दध्मुः पृथक्पृथक्’- महारथी शिखंडी बहुत शूरवीर था। यह पहले जन्म में स्त्री था और इस जन्म में भी राजा द्रुपद को पुत्री रूप से प्राप्त हुआ था। आगे चलकर यही शिखंडी स्थूणाकर्ण नामक यक्ष से पुरुषत्व प्राप्त करके पुरुष बना। भीष्म जी इन सब बातों को जानते थे और शिखंडी को स्त्री ही समझते थे। इस कारण वे इस पर बाण नहीं चलाते थे। अर्जुन ने युद्ध के समय इसी को आगे करके भीष्म जी पर बाण चलाये और उनको रथ से नीचे गिरा दिया। अर्जुन का पुत्र अभिमन्यु बहुत शूरवीर था। युद्ध के समय इसने द्रोणनिर्मित चक्रव्यूह में घुसकर अपने पराक्रम से बहुत से वीरों का संहार किया। अंत में कौरव सेना के छः महारथियों ने इसको अन्यायपूर्वक घेरकर इस पर शस्त्र-अस्त्र चलाये। दुःशासन पुत्र के द्वारा सिर पर गदा का प्रहार होने से इसकी मृत्यु हो गयी। संजय ने शंखवादन के वर्णन में कौरव सेना के शूरवीरों में से केवल भीष्म जी का ही नाम लिया और पांडव सेना के शूरवीरों में से भगवान श्रीकृष्ण, अर्जुन, भीम आदि अठारह वीरों के नाम लिये। इससे ऐसा प्रतीत होता है कि संजय के मन में अधर्म के पक्ष का आदर नहीं है। इसलिये वे अधर्म के पक्ष का अधिक वर्णन करना उचित नहीं समझते। परंतु उनके मन में धर्म के पक्ष का आदर होने से और भगवान श्रीकृष्ण तथा पांडवों के प्रति आदरभाव होने से वे उनके पक्ष का ही अधिक वर्णन करना उचित समझते हैं और उनके पक्ष का वर्णन करने में ही उनको आनंद आ रहा है।

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बुधवार, 7 सितंबर 2016

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संबंध- अब संजय आगे के चार श्लोकों में पूर्व श्लोक का खुलासा करते हुए दूसरों के शंखवादन का वर्णन करते हैं।

पाञ्चजन्यं हृषीकेशो देवदत्तं धनञ्जयः।
पौंड्र दध्मौ महाशंख भीमकर्मा वृकोदरः।। 15 ।।

अर्थ- अंतर्यामी भगवान श्रीकृष्ण ने पाञ्चजन्य नामक तथा धनञ्जय अर्जुन ने देवदत्त नामक शंख बजाया; और भयानक कर्म करने वाले वृकोदर भीम ने पौंड्र नामक महाशंख बजाया।

व्याख्या- ‘पाञ्यजन्यं हृषीकेशः’- सबके अन्तर्यामी अर्थात सबके भीतर की बात जाने वाले साक्षात भगवान श्रीकृष्ण ने पाण्डवों के पक्ष में खड़े होकर ‘पाञ्चजन्य’ नामक शंख बजाया। भगवान पंचजन नामक शंख रुपधारी दैत्य को मारकर उसको शंखरुप से ग्रहण किया था, इसलिए इस शंख का नाम ‘पाञ्चजन्य’ हो गया।

देवदत्तं धनञ्जयः- राजसूय यज्ञ के समय अर्जुन ने बहुत से राजाओं को जीतकर बहुत धन इकट्ठा किया था। इस करण अर्जुन का नाम ‘धनञ्जय’ पड़ गया। निवातकवचादि दैत्यों के साथ युद्ध करते समय इंद्र ने अर्जुन को ‘देवदत्त’ नामक शंख दिया था। इस शंख की ध्वनि बड़े जोर से होती थी, जिससे शत्रुओं की सेना घबरा जाती थी। इस शंख को अर्जुन ने बजाया। ‘पौंड्र दध्मौ महाशंख भीमकर्ता वृकोदरः’- हिडिम्बासुर, बकासुर, जटासुर आदि असुरों तथा कीचक, जरासन्ध आदि बलवान वीरों को मारने के कारण भीमसेन का नाम ‘भीमकर्मा’ पड़ गया। उनके पेट में जठराग्नि के सिवाय ‘वृक’ नाम की एक विशेष अग्नि थी, जिससे बहुत अधिक भोजन पचता था। इस कारण उनका नाम ‘वृकोदर’ पड़ गया। ऐसे भीमकर्मा वृकोदर भीमसेन ने बहुत बड़े आकार वाला ‘पौंड्र’ नामक शंख बजाया।

 अनन्तविजयं राजा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः।
नकुलः सहदेवश्च सुघोषमणिपुष्पकौ।। 16 ।।

अर्थ- कुंती पुत्र राजा युधिष्ठिर ने अनन्तविजय नामक शंख बजाया तथा नकुल और सहदेव ने सुघोष और मणिपुष्पक नामक शंख बजाये।

व्याख्या- ‘अनन्तविजयं राजा....... सुघोषमणि पुष्पकौ’- अर्जुन, भीम और युधिष्ठिर- ये तीनों कुंती के पुत्र हैं तथा नकुल और सहदेव- ये दोनों माद्री के पुत्र हैं, यह विभाग दिखाने के लिए ही यहाँ युधिष्ठिर के लिए ‘कुंतीपुत्र’ विशेषण दिया गया है। युधिष्ठिर को राजा कहने का तात्पर्य है कि युधिष्ठिर जी वनवास के पहले अपने आधे राज्य के राजा थे, और नियम के अनुसार बारह वर्ष वनवास और एक वर्ष अज्ञातवास के बाद वे राजा होने चाहिए थे। ‘राजा’ विशेषण देकर संजय यह भी संकेत करना चाहते हैं कि आगे चलकर धर्मराज युद्धिष्ठिर ही संपूर्ण पृथ्वीमंडल के राजा होंगे।

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दिव्यौ शंखौ प्रद्ध्मतुः- भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन के हाथों में जो शंख थे, वे तेजोमय और अलौकिक थे। उन शंखों को उन्होंने बड़े जोर से बजाया।
यहाँ शंका हो सकती है कि कौरव पक्ष में मुख्य सेनापति पितामह भीष्म हैं, इसलिए उनका सबसे पहले शंख बजाना ठीक ही है; परंतु पांडव सेना में मुख्य सेनापति धृष्टद्युम्न के रहते हुए ही सारथि बने हुए भगवान श्रीकृष्ण ने सबसे पहले शंख क्यों बजाया? इसका समाधान है कि भगवान सारथि बने चाहें महारथी बनें, उनकी मुख्यता कभी मिट ही नहीं सकती। वे जिस किसी भी पद पर रहें, सदा सबसे बड़े ही बने रहते हैं। कारण कि वे अच्युत हैं, कभी च्युत होते ही नहीं। पांडव सेना में भगवान श्रीकृष्ण ही मुख्य थे और वे ही सबका संचालन करते थे। जब वे बाल्यावस्था में थे, उस समय भी नंद, उपनंद आदि उनकी बात मानते थे। तभी तो उन्होंने बालक श्रीकृष्ण के कहने से परंपरा से चली आयी इंद्र- पूजा को छोड़कर गोवर्धन की पूजा करनी शुरू कर दी। तात्पर्य है कि भगवान जिस किसी अवस्था में, जिस किसी स्थान पर और जहाँ कहीं भी रहते हैं, वहाँ वे मुख्य ही रहते हैं। इसीलिये भगवान ने पांडव सेना में सबसे पहले शंख बजाया। जो स्वयं छोटा होता है, वही ऊँचे स्थान पर नियुक्त होने से बड़ा माना जाता है। अतः जो ऊँचे स्थान के कारण अपने को बड़ा मानता है, वह स्वयं वास्तव में छोटा ही होता है। परंतु जो स्वयं बड़ा होता है, वह जहाँ भी रहता है, उसके कारण वह स्थान भी बड़ा माना जाता है। जैसे भगवान यहाँ सारथि बने हैं, तो उनके कारण वह सारथि का स्थान भी ऊँचा हो गया।

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रविवार, 4 सितंबर 2016

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संबंध- इस अध्याय के आरंभ में धृतराष्ट्र ने संजय से पूछा था कि युद्ध क्षेत्र में मेरे और पांडव के पुत्रों ने क्या किया? अतः संजय ने दूसरे श्लोक से तेरहवें श्लोक तक ‘धृतराष्ट्र पुत्रों ने क्या किया’- इसका उत्तर दिया। अब आगे के श्लोक से संजय ‘पांडु के पुत्रों ने क्या किया’- इसका उत्तर देते हैं।

ततः श्वेतैर्हयैर्युक्ते महति स्यन्दने स्थितौ ।
माधवः पाण्डवश्चैव दिव्यौ शंखो प्रदध्मतुः ।। 14 ।।

अर्थ- उसके बाद सफेद घोड़ों से युक्त महान रथ पर बैठे हुए लक्ष्मीपति भगवान श्रीकृष्ण और पांडुपुत्र अर्जुन ने दिव्य शंखों को बड़े जोर से बजाया।

व्याख्या- ‘ततः श्वेतैर्हयैर्युक्ते’- चित्र रथ गंधर्व ने अर्जुन को सौ दिव्य घोड़े दिए थे। इन घोड़ों में यह विशेषता थी की इनमें से युद्ध में कितने ही घोड़े क्यों न मारे जायँ, पर ये संख्या में सौ के सौ ही बने रहते थे, कम नहीं होते थे। ये पृथ्वी, स्वर्ग आदि सभी स्थानों में जा सकते थे। इन्हीं सौ घोड़ों में से सुंदर और सुशिक्षित चार सफेद घोड़े अर्जुन के रथ में जुते हुए थे।

महति स्यन्दने स्थितौ- यज्ञों में आहुति रूप से दिए गये घी को खाते-खाते अग्नि को अजीर्ण हो गया था। इसीलिए अग्निदेव खांडव वन की विलक्षण-विलक्षण जड़ी बूटियाँ खाकर अपना अजीर्ण दूर करना चाहते थे। परन्तु देवताओं के द्वारा खांडव वन की रक्षा की जाने के कारण अग्निदेव अपने कार्य में सफल नहीं हो पाते थे। वे जब-जब खांडववन को जलाते, तब-तब इंद्र वर्षा करके उसको बुझा देते। अंत में अर्जुन की सहायता से अग्नि ने उस पूरे वन को जलाकर अपना अजीर्ण दूर किया और प्रसन्न होकर अर्जुनको यह बहुत बड़ा रथ दिया। नौ बैलगाड़ियों में जितने अस्त्र-शस्त्र आ सकते हैं, उतने अस्त्र-शस्त्र इस रथ में पड़े रहते थे। यह सोने से मढ़ा हुआ और तेजोमय था। इसके पहिए बड़े ही दृढ़ एवं विशाल थे। इसकी ध्वजा बिजली के समान चमकती थी। यह ध्वजा एक योजन तक फहराया करती थी। इतनी लंबी होने पर भी इसमें न तो बोझ था, न यह कहीं रुकती थी और न कहीं वृक्ष आदि में अटकती ही थी। इस ध्वजा पर हनुमान जी विराजमान थे।

‘स्थितौ’ कहने का तात्पर्य है कि उस सुंदर और तेजोमय रथ पर साक्षात भगवान श्रीकृष्ण और उनके प्यारे भक्त अर्जुन के विराजमान होने से उस रथ की शोभा और तेज बहुत ज्यादा बढ़ गया था।

माधवः पांडवश्चैव- ‘मा’ नाम लक्ष्मी का है और ‘धव’ नाम पति का है। अतः ‘माधव’ नाम लक्ष्मीपति का है। यहाँ ‘पांडव’ नाम अर्जुन का है; क्योंकि अर्जुन सभी पांडवों में मुख्य है- ‘पांडवानां धनंज्यः’। अर्जुन ‘नर’ के और श्रीकृष्ण ‘नारायण’ के अवतार थे। महाभारत के प्रत्येक पर्व के आरंभ में नर और नारायण को नमस्कार किया गया है- ‘नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तम्म।’ इस दृष्टि से पांडव सेना में भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन- ये दोनों मुख्य थे। संजय ने भी गीता के अंत में कहा है कि ‘जहाँ योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण और गांडीव-धनुषधारी अर्जुन रहेंगे, वहीं पर श्री, विजय, विभूति और अटल नीति रहेगी’।

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शुक्रवार, 2 सितंबर 2016

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संबंध- पितामह भीष्म के द्वारा शंख बजाने का परिणाम क्या हुआ, इसको संजय आगे श्लोक में कहते हैं।

ततः शंखाश्च भेर्यश्च पणवानकगोमुखाः ।
सहसैवाभ्यहन्यन्त स शब्दस्तुमुलोऽभवत् ।। 13 ।।

अर्थ- उसके बाद शंख, भेरी, ढोल, मृदंग और नरसिंघे बाजे एक साथ बज उठे। उनका वह शब्द बड़ा भयंकर हुआ।


व्याख्या- ‘ततः शंखाश्च भेर्यश्च पणवानक गोमुखाः’- यद्यपि भीष्म जी ने युद्धारम्भ की घोषणा करने के लिए ही शंख बजाया था, तथापि कौरव सेना ने भीष्म जी के शंखवादन को युद्ध की घोषणा ही समझा। अतः भीष्म जी के शंख बजाने पर कौरव सेना के शंख आदि सब बाजे एक साथ बज उठे।

‘शंख’- समुद्र से उत्पन्न होते हैं। ये ठाकुर जी की सेवा-पूजा में रखे जाते हैं और आरती उतारने आदि के काम में आते हैं। मांगलिक कार्यों में तथा युद्ध के आरंभ में ये मुख से फूँद देकर बजाये जाते हैं। ‘भेरी’ नाम नगाड़ों का है ये नगाड़े लोहे के बने हुए और भैंस के चमड़े से मढ़े हुए होते हैं तथा लकड़ी के डंडे से बजाये जाते हैं। ये मंदिरों में एवं राजाओं के किलों में रखे जाते हैं। उत्सव और मांगलिक कार्यों में ये विशेषता से बजाये जाते है। राजाओं के यहाँ से रोज बजाए जाते हैं। ‘पणव’ नाम ढोल का है। ये लोहे के अथवा लकड़ी के बने हुए और बकरे के चमड़े से मढ़े हुए होते हैं तथा हाथ से या लकड़ी के डंडे से बजाये जाते हैं। ये आकार में ढोलकी की तरह होने पर भी ढोलकी से बड़े होते हैं। कार्य के आरंभ में पणवों को बजाना गणेश जी के पूजन के समान मांगलिक माना जाता है। ‘आनक’ नाम मृदंग का है। इनको पखावज भी कहते हैं। आकार में ये लकड़ी की बनायी हुई ढोलकी के समान होते हैं। ये मिट्टी के बने हुए और चमड़े से मढ़े हुए होते हैं तथा हाथ से बजाये जाते हैं। ‘गोमुख’ नाम नरसिंघे का है। ये आकार में साँप की तरह टेढ़े होते हैं और इनका मुख गाय की तरह होता है। ये मुख की फूँक से बजाये जाते हैं।

सहसैवाभ्यहन्यन्त- कौरव सेना में उत्साह बहुत था। इसलिए पितामह भीष्म का शंख बजते ही कौरव सेना के सब बाजे अनायास ही एक साथ बज उठे। उनके बजने में देरी नहीं हुई तथा उनको बजाने में परिश्रम भी नहीं हुआ। ‘स शब्दस्तुमुलोऽभवत्’- अलग-अलग विभागों में, टुकड़ियों में खड़ी हुई कौरव सेना के शंख आदि बाजों का शब्द बड़ा भयंकर हुआ अर्थात उनकी आवाज बड़ी जोर से गूँजती रही।

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गुरुवार, 1 सितंबर 2016

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तस्य संजनयन्हर्षं कुरुवृद्धः पितामहः ।
सिंहनादं विनद्योच्चैः शंखंदध्मौ प्रतापवान् ।। 12 ।।

अर्थ- दुर्योधन के हृदय में हर्ष उत्पन्न करते हुए कुरुवृद्ध प्रभावशाली पितामह भीष्म ने सिंह के समान गरजकर जोर से शंख बजाया।

व्याख्या- ‘तस्य संजनयन् हर्षम्’- यद्यपि दुर्योधन के हृदय में हर्ष होना शंखध्वनि का कार्य है और शंख ध्वनि कारण है, इसलिए यहाँ शंख ध्वनि का वर्णन पहले और हर्ष होने का वर्णन पीछे होने चाहिये अर्थात यहाँ ‘शंख बजाते हुए दुर्योधन को हर्षित किया’- ऐसा कहा जाना चाहिये। परंतु यहाँ ऐसा न कहकर यही कहा है कि ‘दुर्योधन को हर्षित करते हुए भीष्म जी ने शंख बजाया।’ कारण कि ऐसा कहकर संजय यह भाव प्रकट कर रहे हैं कि पितामह भीष्म की संखवादन क्रिया मात्र से दुर्योधन के हृदय में हर्ष उत्पन्न हो ही जाएगा। भीष्म जी के इस प्रभाव को द्योतन करने के लिए ही संजय आगे ‘प्रतापवान्’ विशेषण देते हैं।
कुरुवृद्धः- यद्यपि कुरुवंशियों में आयु की दृष्टि से भीष्म जी से भी अधिक वृद्ध बाह्लीक थे, तथापि कुरुवंशियों में जितने बड़े-बूढ़े थे, उन सब में भीष्म जी धर्म और ईश्वर को विशेषता से जानने वाले थे। अतः ज्ञानवृद्ध होने के कारण संजय भीष्म जी के लिए ‘कुरुवृद्धः’ विशेषण देते हैं। ‘प्रतापवान्’- भीष्मजी के त्याग का बड़ा प्रभाव था। वे कनक-कामिनी के त्यागी थे अर्थात उन्होंने राज्य भी स्वीकार नहीं किया और विवाह भी नहीं किया। भीष्मजी अस्त्र-शस्त्र को चलाने में बड़े निपुण थे और शास्त्र के भी बड़े जानकार थे। उनके इन दोनों गुणों का भी लोगों पर बड़ा प्रभाव था। जब अकेले भीष्म अपने भाई विचित्रवीर्य के लिए काशिराज की कन्याओं को स्वयंवर से हरकर ला रहे थे, तब वहाँ स्वयंवर के लिए इकट्ठे हुए सब क्षत्रिय उन पर टूट पड़े। परंतु अकेले भीष्म जी ने उन सबको हरा दिया। जिनसे भीष्म अस्त्र-शस्त्री की विद्या पढ़े थे, उन पर गुरु परशुराम जी के सामने भी उन्होंने अपनी हार स्वीकार नहीं की। इस प्रकार शास्त्र के विषय में उनका क्षत्रियों पर बड़ा प्रभाव था। जब भीष्म शर-शय्या पर सोये थे, तब भगवान श्रीकृष्ण ने धर्मराज से कहा कि ‘आपको धर्म के विषय में कोई शंका हो तो भीष्म जी से पूछ लें; क्योंकि शास्त्रज्ञान का सूर्य अस्ताचल को जा रहा है अर्थात भीष्म जी इस लोक से जा रहे हैं।’ इस प्रकार शास्त्र के विषय में उनका दूसरों पर बड़ा प्रभाव था।
पितामहः- इस पद का आशय यह मालूम देता है कि दुर्योधन के द्वारा चालाकी से कही गई बातों का द्रोणाचार्य ने कोई उत्तर नहीं दिया। उन्होंने यही समझा कि दुर्योधन चालाकी से मेरे को ठगना चाहता है, इसलिए वे चुप ही रहे। परंतु पितामह होने के नाते भीष्म जी को दुर्योधन की चालाकी में उसका बचपन दीखता है। अतः पितामह भीष्म द्रोणाचार्य समान चुप न रहकर वात्सल्यभाव के कारण दुर्योधन को हर्षित करते हुए शंख बजाते हैं। ‘सिंहनादं विनद्योच्चैः शंख दध्मौ’- जैसे सिंह के गर्जना करने पर हाथी आदि बड़े-बड़े पशु भी भयभीत हो जाते हैं, ऐसे ही गर्जना करने मात्र से सभी भयभीत हो जायँ और दुर्योधन प्रसन्न हो जाए- इसी भाव से भीष्म जी ने सिंह के समान गरजकर जोर से शंख बजाया।

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सोमवार, 29 अगस्त 2016

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🌹 श्रीमद्भगवद्गीता :
🌹 साधक-संजीवनी :

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❄ प्रथम अध्याय :

संबंध- अब दुर्योधन पितामह भीष्म को प्रसन्न करने के लिए अपनी सेना के सभी महारथियों से कहता है।

अयनेषु च सर्वेषु यथाभागमवस्थिताः ।
भीष्ममेवाभिरक्षन्तु भवन्तः सर्व एव हि ।। 11 ।।

अर्थ- आप सब-के-सब लोग सभी मोर्चों पर अपनी-अपनी जगह दृढ़ता से स्थित रहते हुए ही पितामह भीष्म की चारों ओर से रक्षा करें।

व्याख्या- ‘अयनेषु च सर्वेषु..... भवन्तः सर्व एव हि’- जिन-जिन मोर्चों पर आपकी नियुक्ति कर दी गई है, आप सभी योद्धा लोग उन्हीं मोर्चों पर दृढ़ता से स्थित रहते हुए सब तरफ से, सब प्रकार से भीष्म जी की रक्षा करें। भीष्म जी की सब ओर से रक्षा करें- यह कहकर दुर्योधन भीष्म जी को भीतर से अपने पक्ष में लाना चाहता है। ऐसा कहने का दूसरा भाव यह है कि जब भीष्म जी युद्ध करें, तब किसी भी व्यूह द्वार से शिखण्डी उनके सामने न आ जाए- इसका आप लोग खयाल रखें। अगर शिखण्डी उनके सामने आ जायगा, तो भीष्मजी उस पर शास्त्रास्त्र नहीं चलायेंगे। कारण कि शिखण्डी पहले जन्म में भी स्त्री था और इस जन्म में भी पहले स्त्री था, पीछे पुरुष बना है। इसलिए भीष्म जी इसको स्त्री ही समझते हैं और उन्होंने शिखण्डी से युद्ध न करे की प्रतिज्ञा कर रखी है। यह शिखण्डी शंकर के वरदान से भीष्म जी को मारने के लिए ही पैदा हुआ है। अतः जब शिखण्डी से भीष्म जी की रक्षा हो जायगी, तो फिर वे सबको मार देंगे, जिससे निश्चित ही हमारी विजय होगी। इस बात को लेकर दुर्योधन सभी महारथियों से भीष्म जी की रक्षा करने के लिए कह रहा है।
संबंध- द्रोणाचार्य के द्वारा कुछ भी न बोलने के कारण दुर्योधन का मानसिक उत्साह भंग हुआ देखकर उसके प्रति भीष्मजी के किये हुए स्नेह सौहार्द की बात संजय आगे श्लोक में प्रकट करते हैं।

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मंगलवार, 23 अगस्त 2016

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 🌹🔱🔅श्रीमद्भगवद्गीता🔅🔱🌹

🌹 श्रीमद्भगवद्गीता :
🌹 साधक-संजीवनी :
🌹 प्रथम अध्याय :

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❄ विशेष बात :

अर्जुन कौरव-सेना को देखकर किसी के पास न जाकर हाथ में धनुष उठाते हैं, पर दुर्योधन पांडव सेना को देखकर द्रोणाचार्य के पास जाता है और उनसे पांडवों की व्यूहरचनायुक्त सेना को देखने के लिए कहता है। इससे सिद्ध होता है कि दुर्योधन के हृदय में भय बैठा हुआ है । भीतर में भय होने पर भी वह चालाकी से द्रोणाचार्य को प्रसन्न करना चाहता है, उनको पांडवों के विरुद्ध उकसाना चाहता है। कारण कि दुर्योधन के हृदय में अधर्म है, अन्याय है, पाप है। अन्यायी, पापी व्यक्ति कभी निर्भय और सुख-शांति से नहीं रह सकता- यह नियम है। परंतु अर्जुन के भीतर धर्म है, न्याय है। इसलिए अर्जुन के भीतर अपना स्वार्थ सिद्ध करने के लिए चालाकी नहीं है, भय नहीं है; किंतु उत्साह है, वीरता है। तभी तो वे वीरता में आकर सेना-निरीक्षण करने के लिए भगवान को आज्ञा देते हैं कि ‘हे अच्युत! दोनों सेनाओं के मध्य मेरे रथ को खड़ा कर दीजिये’। इसका तात्पर्य है कि जिसके भीतर नाशवान धन संपत्ति आदि का आश्रय है, आदर है और जिसके भीतर अधर्म है अन्याय है, दुर्भाव है, उसके भीतर वास्तविक बल नहीं होता। वह भीतर से खोखला होता है और वह कभी निर्भय नहीं होता। परंतु जिसके भीतर अपने धर्म का पालन है और भगवान का आश्रय है, वह कभी भयभीत नहीं होता। उसका बल सच्चा होता है। वह सदा निश्चिंत और निर्भय रहता है। अतः अपना कल्याण चाहने वाले सुधाकों को अधर्म, अन्याय आदि का सर्वथा त्याग करके और एकमात्र भगवान का आश्रय लेकर भगवत्प्रीत्यर्थ अपने धर्म का अनुष्ठान करना चाहिये। भौतिक संपत्ति को महत्व देकर और संयोगजन्य सुख के प्रलोभन में फँसकर कभी अधर्म का आश्रय नहीं लेना चाहिये, क्योंकि इन दोनों से मनुष्य का कभी हित नहीं होता, प्रत्युत अहित ही होता है।

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रविवार, 21 अगस्त 2016

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🌹 श्रीमद्भगवद्गीता :
🌹 साधक-संजीवनी :
🌹 प्रथम अध्याय :

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संबंध- दुर्योधन की बातें सुनकर जब द्रोणाचार्य कुछ भी नहीं बोले, तब अपनी चालाकी न चल सकने से दुर्योधन के मन में क्या विचार आता है- इसको संजय आगे के श्लोक में कहते हैं।

अपर्याप्तं तदस्माकं बलं भीष्माभिरक्षितम् ।
पर्याप्तं त्विदमेतेषां बलं भीमाभिरक्षितम् ।। 10 ।।

वह हमारी सेना पांडवों पर विजय करने में अपर्याप्त है, असमर्थ है; क्योंकि उसके संरक्षक भीष्म हैं। परंतु इन पांडवों की सेना हमारे पर विजय करने में पर्याप्त है, समर्थ है; क्योंकि इसके संरक्षक भीमसेन हैं।

व्याख्या- ‘अपर्याप्तं तदस्माकं बलं भीष्माभिरक्षितम्’- अधर्म- अन्याय के कारण दुर्योधन के मन में भय होने से वह अपनी सेना के विषय में सोचता है कि हमारी सेना बड़ी होने पर भी अर्थात पांडवों की अपेक्षा चार अक्षौहिणी अधिक होने पर भी पांडवों पर विजय प्राप्त करने में है तो असमर्थ ही! कारण कि हमारी सेना में मतभेद हैं। उसमें इतनी एकता, निर्भयता, निःसकोचता नहीं है, जितनी की पांडवों की सेना में है। हमारी सेना के मुख्य संरक्षक पितामह भीष्म उभयपक्षपाती हैं अर्थात उनके भीतर कौरव पांडव- दोनों सेनाओं का पक्ष है। वे कृष्ण के बड़े भक्त हैं। उनके हृदय में युधिष्ठिर का बड़ा आदर है। अर्जुन पर भी उनका बड़ा स्नेह है। इसलिए वे हमारे पक्ष में रहते हुए भीतर से पांडवों का भला चाहते हैं। वे ही भीष्म हमारी सेना के मुख्य सेनापति हैं। ऐसी दशा में हमारी सेना पांडवों के मुकाबले में कैसे समर्थ हो सकती है? नहीं हो सकती।
‘पर्याप्तं त्विदमेतेषां बलं भीमाभिरक्षितम्’- परंतु जो पांडवों की सेना है, यह हमारे पर विजय करने में समर्थ है। कारण कि इनकी सेना में मतभेद नहीं है, प्रत्युत सभी एकमत होकर संगठित हैं। इनकी सेना का संरक्षक बलवान भीमसेन है, जो कि बचपन से ही मेरे को हराता आया है। यह अकेला ही मेरे सहित सौ भाइयों को मारने की प्रतिज्ञा कर चुका है अर्थात यह हमारा नाश करने पर तुला हुआ है! इसका शरीर वज्र के समान मजबूत है। इसको मैंने जहर पिलाया था, तो भी यह मरा नहीं। ऐसा यह भीमसेन पांडवों की सेना का संरक्षक है, इसलिए यह सेना वास्तव में समर्थ है, पूर्ण है। यहाँ एक शंका हो सकती है कि दुर्योधन ने अपनी सेना के संरक्षक के लिए भीष्म जी का नाम लिया, जो कि सेनापति के पद पर नियुक्त है। परंतु पांडव सेना के संरक्षक के लिए भीमसेन का नाम लिया, जो कि सेनापति नहीं है। इसका समाधान यह है कि दुर्योधन इस समय सेनापतियों की बात नहीं सोच रहा है; किंतु दोनों सेनाओं की शक्ति के विषय में सोच रहा है कि किस सेना की शक्ति अधिक है? दुर्योधन पर आरंभ से ही भीमसेन की शक्ति का, बलवत्ता का अधिक प्रभाव पड़ा हुआ है। अतः वह पांडव सेना के संरक्षक के लिए भीमसेन का ही नाम लेता है।

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गुरुवार, 18 अगस्त 2016

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🌹 श्रीमद्भगवद्गीता :
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🌹प्रथम अध्याय :

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अन्ये च बहवः शूरा मदर्थे त्यक्तजीविताः।
नानाशस्त्रप्रहरणाः सर्वे युद्धविशारदाः।। 9 ।।

अर्थ- इनके अतिरिक्त बहुत से शूरवीर हैं, जिन्होंने मेरे लिए अपने जीने की इच्छा का भी त्याग कर दिया है और जो अनेक प्रकार के शस्त्र-अस्त्रों को चलाने वाले हैं तथा जो सब-के-सब युद्धकला में अत्यंत चतुर हैं।

व्याख्या- ‘अन्ये च बहवः शूरा मदर्थे त्यक्तजीविताः’- मैंने अभी तक अपनी सेना के जितने शूरवीरों के नाम लिए हैं, उनके अतिरिक्त भी हमारी सेना में बाह्लीक, शल्य, भगदत्त, जयद्रथ आदि बहुत से शूरवीर महारथी हैं, जो मेरी भलाई के लिये, मेरी ओर से लड़ने के लिये अपने जीने की इच्छा का त्याग करके यहाँ आये हैं। वे मेरी विजय के लिये मर भले ही जायँ, पर युद्ध से हटेंगे नहीं। उनकी मैं आपके सामने क्या कृतज्ञता प्रकट करूँ।
नानाशस्त्रप्रहरणाः सर्वे युद्धविशारदाः- ये सभी लोग हाथ में रखकर प्रहार करने वाले तलवार, गदा, त्रिशूल आदि नाना प्रकार के शस्त्रों की कला में निपुण हैं; और हाथ से फेंककर प्रहार करने वाले बाण, तोमर, शक्ति आदि अस्त्रों की कला में भी निपुण हैं। युद्ध कैसे करना चाहिये; किस तरह से, किस पैंतरे से और किस युक्ति से युद्ध करना चाहिये; सेना को किस तरह खड़ी करनी चाहिये; आदि युद्ध की कलाओं में भी बड़े निपुण हैं, कुशल हैं।

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मंगलवार, 16 अगस्त 2016

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🌹 प्रथम अध्याय :

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भवान्भीष्मश्च कर्णश्च कृपश्च समितिञ्जयः ।
अश्वस्थामा विकर्णश्च सौमदत्तिस्तथैव च ।। 8 ।।

अर्थ- आप और पितामह भीष्म तथा कर्ण और संग्राम विजयी कृपाचार्य तथा वैसे ही अश्वत्थामा, विकर्ण और सोमदत्त का पुत्र भूरिश्रवा।

व्याख्या- ‘भगवान् भीष्मश्च’- आप और पितामह भीष्म- दोनों ही बहुत विशेष पुरुष हैं। आप दोनों के समकक्ष संसार में तीसरा कोई भी नहीं है। अगर आप दोनों में से कोई एक भी अपनी पूरी शक्ति लगाकर युद्ध करे, तो देवता, यक्ष, राक्षस, मनुष्य आदि में ऐसा कोई भी नहीं है, जो कि आपके सामने टिक सके। आप दोनों के पराक्रम की बात जगत में प्रसिद्ध ही है। पितामह भीष्म तो आबाल ब्रह्मचारी है, और इच्छामृत्यु हैं अर्थात उनकी इच्छा के बिना उन्हें कोई मार ही नहीं सकता।
[ महाभारत- युद्ध में द्रोणाचार्य धृष्टद्युम्र के द्वारा मारे गए और पितामह भीष्म ने अपनी इच्छा से ही सूर्य के उत्तरायण होने पर अपने प्राणों का त्याग कर दिया।]
'कर्णश्च'- कर्ण तो बहुत ही शूरवीर है। मुझे तो ऐसा विश्वास है कि वह अकेला ही पांडव- सेना पर विजय प्राप्त कर सकता है। उसके सामने अर्जुन भी कुछ नहीं कर सकता। ऐसा वह कर्ण भी हमारे पक्ष में है।
[कर्ण महाभारत- युद्ध में अर्जुन के द्वारा मारे गये।]
कृपश्च समितिञ्जयः- कृपाचार्य की बात ही क्या है! वे तो चिरंजीवी है, हमारे परम हितैषी हैं और संपूर्ण पांडव- सेना पर विजय प्राप्त कर सकते हैं। यद्यपि यहाँ द्रोणाचार्य और भीष्म के बाद ही दुर्योधन को कृपाचार्य का नाम लेना चाहिए था; परंतु दुर्योधन को कर्ण पर जितना विश्वास था, उतना कृपाचार्य पर नहीं था। इसलिए कर्ण का नाम तो भीतर से बीच में ही निकल पड़ा। द्रोणाचार्य और भीष्म कहीं कृपाचार्य का अपमान न समझ लें, इसलिए दुर्योधन कृपाचार्य को ‘संग्रामविजयी’ विशेषण देकर उनको प्रसन्न करना चाहता है।
अश्वत्थामा- ये भी चिरंजीवी हैं और आपके ही पुत्र हैं। ये बड़े शूरवीर हैं। उन्होंने आपसे ही अस्त्र-शस्त्र की विद्या सीखी है। अस्त्र-शस्त्र की कला में ये बड़े चतुर हैं।
विकर्णश्च सौमदत्तिस्तथैव च- आप यह न समझें कि केवल पांडव ही धर्मात्मा हैं, हमारे पक्ष में भी मेरा भाई विकर्ण बड़ा धर्मात्मा और शूरवीर है। ऐसे ही हमारे प्रतिमाह शांतनु के भाई बाह्लीक के पौत्र तथा सोमदत्त के पुत्र भूरिश्रवा भी बड़े धर्मात्मा हैं। इन्होंने बड़ी-बड़ी दक्षिणा वाले अनेक यज्ञ किए हैं। ये बड़े शूरवीर और महारथी हैं।
[युद्ध में विकर्ण भीम के द्वारा और भूरिश्रवा सात्यिक के द्वारा मारे गये।]
यहाँ इन शूरवीर के नाम लेने में दुर्योधन का यह भाव मालूम देता है कि हे आचार्य! हमारी सेना में आप, भीष्म, कर्ण, कृपाचार्य आदि जैसे महान पराक्रमी शूरवीर हैं, ऐसे पांडवों की सेना में देखने में नहीं आते। हमारी सेना में कृपाचार्य और अश्वत्थामा- ये दो चिरंजीवी हैं, जबकि पांडवों की सेना में ऐसा एक भी नहीं है। हमारी सेना में धर्मात्माओं की भी कमी नहीं है। इसलिए हमारे लिये डरने की कोई बात नहीं है।

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शनिवार, 13 अगस्त 2016

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संबंध- द्रोणाचार्य के मन में पांडवों के प्रति द्वेष पैदा करने और युद्ध के लिए जोश दिलाने के लिए दुर्योधन ने पांडव सेना की विशेषता बतायी। दुर्योधन के मन में विचार आया कि द्रोणाचार्य पांडवों के पक्षपाती हैं ही; अतः वे पांडव सेना की महत्ता सुनकर मेरे को यह कह सकते हैं कि जब पांडवों की सेना में इतनी विशेषता है, तो उनके साथ तू संधि क्यों नही कर लेता? ऐसा विचार आते ही दुर्योधन आगे के तीन श्लोकों में अपनी सेना की विशेषता बताता है।

अस्माकं तु विशिष्टा ये तान्निबोध द्विजोत्तम ।
नायका मम सैन्यस्य संज्ञार्थं तान्ब्रवीमि ते ।। 7 ।।

अर्थ- हे द्विजोत्तम! हमारे पक्ष में भी जो मुख्य हैं, उन पर भी आप ध्यान दीजिये। आपको याद दिलाने के लिये मेरी सेना के जो नायक हैं, उनको मैं कहता हूँ।

व्याख्या- ‘अस्मांक तु विशिष्टा ये तान्निबोध द्विजोत्तम’- दुर्योधन द्रोणाचार्य से कहता है कि हे द्विजश्रेष्ठ! जैसे पांडवों की सेना में श्रेष्ठ महारथी हैं, ऐसे ही हमारी सेना में भी उनसे कम विशेषता वाले महारथी नहीं हैं, प्रत्युत उनकी सेना के महारथियों की अपेक्षा ज्यादा ही विशेषता रखने वाले हैं। उनको भी आप समझ लीजिये। तीसरे श्लोक में ‘पश्य’ और यहाँ ‘निबोध’ क्रिया देने का तात्पर्य है कि पांडवों की सेना तो सामने खड़ी है, इसलिये उसको देखने के लिये दुर्योधन ‘पश्य’ क्रिया का प्रयोग करता है। परंतु अपनी सेना सामने नहीं है अर्थात अपनी सेना की तरफ द्रोणाचार्य की पीठ है, इसलिये उसको देखने की बात न कहकर उस पर ध्यान देने के लिये दुर्योधन ‘निबोध’ क्रिया का प्रयोग करता है।
‘नायका मम सैन्यस्य संज्ञार्थ तान्ब्रवीमि ते’- मेरी सेना में भी जो विशिष्ट-विशिष्ट सेनापति हैं, सेनानायक हैं, महारथी हैं, मैं उनके नाम केवल आपको याद दिलाने के लिये, आपकी दृष्टि उधर खींचने के लिये ही कह रहा हूँ।
‘संज्ञार्थम्’ पद का तात्पर्य है कि हमारे बहुत से सेना नायक हैं, उनके नाम मैं कहाँ तक कहूँ; इसलिये मैं उनका केवल संकेतमात्र करता हूँ; क्योंकि आप तो सबको जानते ही हैं। इस श्लोक में दुर्योधन का ऐसा भाव प्रतीत होता है कि हमारा पक्ष किसी भी तरह कमजोर नहीं है। परंतु राजनीति के अनुसार शत्रुपक्ष चाहे कितना ही कमजोर हो और अपना पक्ष चाहे कितना ही सबल हो, ऐसी अवस्था में भी शत्रुपक्ष को कमजोर नहीं समझना चाहिये और अपने में उपेक्षा, उदासीनता आदि की भावना किश्चिन्मात्र भी नहीं आने देनी चाहिये।
इसलिये सावधानी के लिये मैंने उसकी सेना की बात कही और अब अपनी सेना की बात कहता हूँ। दूसरा भाव यह है कि पांडवों की सेना को देखकर दुर्योधन पर बड़ा प्रभाव पड़ा और उसके मन में कुछ भय भी हुआ। कारण कि संख्या में कम होते हुये भी पांडव के पक्ष में बहुत से धर्मात्मा पुरुष थे और स्वयं भगवान थे। जिस पक्ष में धर्म और भगवान रहते हैं, उसका सब पर बड़ा प्रभाव पड़ता है। पापी-से-पापी, दुष्ट-से-दुष्ट व्यक्ति पर भी उसका प्रभाव पड़ता है। इतना ही नहीं, पशु-पक्षी, वृक्ष-लता आदि पर भी उसका प्रभाव पड़ता है। कारण कि धर्म और भगवान नित्य हैं। कितनी ऊँची-से-ऊँची भौतिक शक्तियाँ क्यों न हों, हैं वे सभी अनित्य ही। इसलिये दुर्योधन पर पांडव सेना का बड़ा असर पड़ा। परंतु उसके भीतर भौतिक बल का विश्वास मुख्य होने से वह द्रोणाचार्य को विश्वास दिलाने के लिये कहता है कि हमारे पक्ष में जितनी विशेषता है, उतनी पांडवों की सेना में नहीं है। अतः हम उन पर सहज ही विजय कर सकते हैं।

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गुरुवार, 11 अगस्त 2016

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🌹 श्रीमद्भगवद्गीता :
🌹 साधक-संजीवनी :
🌹 प्रथम अध्याय :

( गत ब्लाग से आगे )

पुरुजित्कुन्तिभोजश्च- यद्यपि पुरुजित और कुंतिभोज- ये दोनों कुंती के भाई होने से हमारे और पांडवों के मामा हैं, तथापि इनके मन में पक्षपात होने के कारण ये हमारे विपक्ष में युद्ध करने के लिए खड़े हैं।
[पुरुजित और कुंतिभोज- दोनों ही युद्ध में द्रोणाचार्य के हाथ से मारे गए।]
‘शैब्यश्च नरपुंगवः’- यह शैव्य युधिष्ठिर का श्वशुर है। यह मनुष्यों में श्रेष्ठ और बहुत बलवान है। परिवार के नाते यह भी हमारा सम्बन्ध है। परंतु यह पांडवों के ही पक्ष में खड़ा है।
‘युधामन्युश्च विक्रान्त उत्तमौजाश्च वीर्यवान्’- पाश्चाल देश के बड़े बलवान और वीर योद्धा युधामन्यु तथा उत्तमौजा मेरे वैरी अर्जुन के रथ के पहियों की रक्षा में नियुक्त किए गए हैं। आप इनकी ओर भी नजर रखना।
[रात में सोते हुए इन दोनों को अश्वत्थामा ने मार डाला।]
सौभद्रः- यह कृष्ण की बहन सुभद्रा का पुत्र अभिमन्यु है। यह बहुत शूरवीर है। इसने गर्भ में ही चक्रव्यूह भेदन की विद्या सीखी है। अतः चक्रव्यूह रचना के समय आप इसका ख्याल रखें।
[युद्ध में दुःशासन पुत्र के द्वारा अन्यापूर्वक सिर पर गदा का प्रहार करने से अभिमन्यु मारे गए।]
‘द्रौपदेयाश्च'- युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन, नकुल और सहदेव- इन पाँचों के द्वारा द्रौपदी के गर्भ से क्रमशः प्रतिविन्ध्य, सुतसोम, श्रुतकर्मा, शतानीक और श्रुतसेन पैदा हुए हैं। इन पाँचों को आप देख लीजिए।द्रौपदी ने भरी सभा में मेरी हँसी उड़ाकर मेरे हृदय को जलाया है, उसी के इन पाँचों पुत्रों को युद्ध में मारकर आप उसका बदला चुकायें।
[रात में सोते हुए इन पाँचों को अश्वत्थामा ने मार डाला।]
‘सर्व एव महारथाः’- ये सब-के-सब महारथी हैं। जो शास्त्र और शस्त्रविद्या- दोनों में प्रवीण हैं और युद्ध में अकेले ही एक साथ दस हजार धनुर्धारी योद्धाओं का संचालन कर सकता है, उस वीर पुरुष को ‘महारथी’ कहते हैं। ऐसे बहुत से महारथी पांडव सेना में खड़े हैं।

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मंगलवार, 9 अगस्त 2016

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ऐसे बड़े-बड़े धनुष पास में होने के कारण ये सभी बहुत बलवान और शूरवीर हैं। ये मामूली योद्धा नहीं है। युद्ध में भीम और अर्जुन के समान हैं अर्थात बल में ये भीम के समान और अस्त्र-शस्त्र की कला में ये अर्जुन के समान हैं।
युयुधानः- युयुधान ने अर्जुन से अस्त्र-शस्त्र की विद्या सीखी थी। इसलिए भगवान श्रीकृष्ण के द्वारा दुर्योधन को नारायणी सेना देने पर भी वह कृतज्ञ होकर अर्जुन के पक्ष में ही रहा, दुर्योधन के पक्ष में नहीं गया। द्रोणाचार्य के मन में अर्जुन के प्रति द्वेषभाव पैदा करने के लिए दुर्योधन महारथियों में सबसे पहले अर्जुन के शिष्य युयुधान का नाम लेता है। तात्पर्य है कि इस अर्जुन को तो देखिए! इसने आपसे ही अस्त्र-शस्त्र चलाना सीखा है और आपने अर्जुन को यह वरदान भी दिया है कि संसार में तुम्हारे समान और कोई धनुर्धर न हो, ऐसा प्रत्यन करूँगा। इस तरह आपने तो अपने शिष्य अर्जुन पर इतना स्नेह रखा है, पर वह कृतघ्न होकर आपके विपक्ष में लड़ने के लिए खड़ा है, जबकि अर्जुन का शिष्य युयुधान उसी के पक्ष में खड़ा है।
[युयुधान महाभारत के युद्ध में न मरकर यादवों के आपसी युद्ध में मारे गए।]
विराटश्च- जिसके कारण हमारे पक्ष का वीर सुशर्मा अपमानित किया गया, आपको सम्मोहन अस्त्र से मोहित होना पड़ा और हम लोगों को भी जिसकी गायें छोड़कर युद्ध से भगना पड़ा, वह राजा विराट आपके प्रतिपक्ष में खड़ा है। राजा विराट के साथ द्रोणाचार्य का ऐसा कोई वैरभाव या द्वेषभाव नहीं था; परंतु दुर्योधन यह समझता है कि अगर ययुधान के बाद मैं द्रुपद का नाम लूँ तो द्रोणाचार्य के मन में यह भाव आ सकता है कि दुर्योधन पांडवों के विरोध में मेरे को उकसाकर युद्ध के लिए विशेषता से प्रेरणा कर रहा है तथा मेरे मन में पांडवों के प्रति वैरभाव पैदा कर रहा है। इसलिए दुर्योधन द्रुपद के नाम से पहले विराट का नाम लेता है, जिससे द्रोणाचार्य मेरी चालाकी न समझ सकें और विशेषता से युद्ध करें।
[राजा विराट उत्तर, श्वेत और शंख नामक तीनों पुत्रों सहित महाभारत- युद्ध में मारे गए।]
‘द्रुपदश्च महारथः’- आपने तो द्रुपद को पहले की मित्रता याद दिलायी, पर उसने सभा में यह कहकर आपका अपमान किया कि मैं राजा हूँ और तुम भिक्षुक हो; अतः मेरी-तुम्हारी मित्रता कैसी? तथा वैरभाव के कारण आपको मारने के लिए पुत्र भी पैदा किया, वही महारथी द्रुपद आपसे लड़ने के ले विपक्ष में खड़ा है।
[राजा द्रुपद युद्ध में द्रोणाचार्य के हाथ से मारे गए।]
धृष्टकेतुः- यह धृष्टकेतु कितना मूर्ख है कि जिसके पिता शिशुपाल को कृष्ण ने भरी सभा में चक्र से मार डाला था, उसी कृष्ण के पक्ष में यह लड़ने के लिए खड़ा है!
[धृष्टकेतु द्रोणाचार्य के हाथ से मारे गए।]
चेकितानः- सब यादव सेना तो हमारी ओर से लड़ने के लिए तैयार है और यह यादव चेकितान पांडवों की सेना में खडा है!
[चेकितान दुर्योधन के हाथ से मारे गए।]
काशिराजश्च वीर्यवान्- यह काशिराज बड़ा ही शूरवीर और महारथी है। यह भी पांडवों की सेना में खड़ा है। इसलिए आप सावधानी से युद्ध करना; क्योंकि यह बड़ा पराक्रमी है।
[काशिराज महाभारत-युद्ध में मारे गए।]

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यद्यपि दुर्योधन यहाँ ‘द्रुपद पुत्र’ के स्थान पर ‘धृष्टद्युम्न’ भी कह सकता था, तथापि द्रोणाचार्य के साथ द्रुपद जो वैर रखता था, उस वैरभाव को याद दिलाने के लिए दुर्योधन यहाँ ‘द्रुपद पुत्रेण’ शब्द का प्रयोग करता है कि अब वैर निकालने का अच्छा मौका है।
‘पाण्डुपुत्राणाम् एतां व्यूढां महतीं चमूं पश्य’- द्रुपद पुत्र के द्वारा पांडवों की इस व्यूहाकार खडी हुई बड़ी भारी सेना को देखिए। तात्पर्य है कि जिन पांडवों पर आप स्नेह रखते हैं, उन्हीं पांडवों ने आपके प्रतिपक्ष में खास आपको मारने वाले द्रुपद पुत्र को सेनापति बनाकर व्यूह-रचना करने का अधिकार दिया है। अगर पांडव आपसे स्नेह रखते तो कम से कम आपको मारने वाले को तो अपनी सेना का मुख्य सेनापति नहीं बनाते, इतना अधिकार तो नहीं देते। परंतु सब कुछ जानते हुए भी उन्होंने उसी को सेनापति बनाया है। यद्यपि कौरवों की अपेक्षा पांडवों की सेना संख्या में कम थी अर्थात कौरवों की सेना ग्यारह अक्षौहिणी और पांडवों की सेना सात अक्षौहिणी थी, तथापि दुर्योधन पांडवों की सेना को बड़ी भारी बता रहा है। पांडवों की सेना को बड़ी भारी कहने में दो भाव मालूम देते हैं-

पांडवों की सेना ऐसे ढंग से व्यूहाकार खड़ी हुई थी, जिससे दुर्योधन को थोड़ी सेना भी बहुत बड़ी दीख रही थी और
पांडव सेना में सब के सब योद्धा एक मत के थे। इस एकता के कारण पांडवों की थोड़ी सेना भी बल में, उत्साह में बड़ी मालूम दे रही थी। ऐसी सेना को दिखाकर दुर्योधन द्रोणाचार्य से यह कहना चाहता है कि युद्ध करते समय आप इस सेना को सामान्य और छोटी न समझें। आप विशेष बल लगाकर सावधानी से युद्ध करें। पांडवों का सेनापति है तो आपका शिष्य द्रुपदपुत्र ही; अतः उस पर विजय करना आपके लिए कौन-सी बड़ी बात है।
 ‘एतां पश्य’ कहने का तात्पर्य है कि यह पांडव सेना युद्ध के लिए तैयार होकर सामने खड़ी है। अतः हम लोग इस सेना पर किस तरह से विजय कर सकते हैं- इस विषय में आपको जल्दी से जल्दी निर्णय लेना चाहिये।
सम्बन्ध- द्रोणाचार्य से पांडवों की सेना देखने के लिये प्रार्थना करके अब दुर्योधन उन्हें पांडव सेना के महारथियों को दिखाता है।

अत्र शूरा महेष्वासा भीमार्जुनसमा युधि ।
युयुधानो विराटश्च द्रुपदश्च महारथः।। 4 ।।
धृष्टकेतुश्चेकितानः काशिराजश्च वीर्यवान् ।
पुरुजित्कुन्तिभोजश्च शैब्यश्च नरपुंग्वः।। 5 ।।
युधामन्युश्च विक्रान्त उत्तमौजाश्च वीर्यवान् ।
सौभद्रो द्रौपदेयाश्च सर्व एव महारथाः।। 6 ।।

अर्थ- यहाँ बड़े-बड़े शूरवीर हैं, जिनके बहुत बड़े-बड़े धनुष हैं तथा जो युद्ध में भीम और अर्जुन के समान हैं। उनमें युयुधान, राजा विराट और महारथी द्रुपद भी हैं। धृष्टकेतु और चेकितान तथा पराक्रमी काशिराज भी हैं। पुरुजित और कुंतिभोज- ये दोनों भाई तथा मनुष्यों में श्रेष्ठ शैब्य भी हैं। पराक्रमी युधामन्यु और |पराक्रमी उत्तमौजा भी हैं। सुभद्रा पुत्र अभिमन्यु और द्रौपदी के पाँचों पुत्र भी हैं। ये सब-के-सब महारथी हैं।

व्याख्या- ‘अत्र शूरा महेष्वासा भीमार्जुनसमा युधि’- जिनसे बाण चलाए जाते हैं, फेंके जाते हैं, उनका नाम ‘इष्वास’ अर्थात धनुष है। ऐसे बड़े-बड़े इष्वास जिनके पास हैं, वे सभी ‘महेश्वास’ हैं। तात्पर्य है कि बड़े धनुषों पर बाण चढ़ाने एवं प्रत्यञ्चा खींचने में बहुत बल लगता है। जोर से खींचकर छोड़ा गया बाण विशेष मार करता है।

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रविवार, 7 अगस्त 2016

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यहाँ शंका हो सकती है कि दुर्योधन को तो पितामह भीष्म के पास जाना चाहिए था, जो कि सेनापति थे। पर दुर्योधन गुरु द्रोणाचार्य के पास ही क्यों गया? इसका समाधान यह है कि द्रोण और भीष्म- दोनों उभय-पक्षपाती थे अर्थात वे कौरव और पांडव- दोनों का ही पक्ष रखते थे। उन दोनों में भी द्रोणाचार्य को ज्यादा राजी करना था; क्योंकि द्रोणाचार्य के साथ दुर्योधन का गुरु के नाते तो स्नेह था, पर कुटुम्ब के नाते स्नेह नहीं था; और अर्जुन पर द्रोणाचार्य की विशेष कृपा थी। अतः उनको राजी करने के लिए दुर्योधन का उनके पास जाना ही उचित था। व्यवहार में भी यह देखा जाता है कि जिसके साथ स्नेह नहीं है, उससे अपना स्वार्थ सिद्ध करने के लिए मनुष्य उसको ज्यादा आदर देकर राजी करता है।
दुर्योधन के मन में यह विश्वास था कि भीष्म जी तो हमारे दादा जी ही हैं; अतः उनके पास न जाऊँ तो भी कोई बात नहीं है। न जाने से अगर वे नाराज भी हो जायँगे तो मैं किसी तरह से उनको राजी कर लूँगा। कारण कि पितामह भीष्म के साथ दुर्योधन का कौटुम्बिक सम्बन्ध और स्नेह था, भीष्म का भी उसके साथ कौटुम्बिक सम्बन्ध और स्नेह था। इसलिए भीष्म जी ने दुर्योधन को राजी करने के लिए जोर से शंख बजाया है।
‘वचनमब्रवीत्’- यहाँ ‘अब्रवीत्’ कहना ही पर्याप्त था; क्योंकि ‘अब्रवीत्’ क्रिया के अंतर्गत ही ‘वचनम्’ आ जाता है अर्थात दुर्योधन बोलेगा, तो वचन ही बोलेगा। इसलिए यहाँ ‘वचनम्’ शब्द की आवश्यकता नहीं थी। फिर भी ‘वचनम्’ शब्द देने का तात्पर्य है कि दुर्योधन नीतियुक्त गंभीर वचन बोलता है, जिससे द्रोणाचार्य के मन में पांडवों के प्रति द्वेष पैदा हो जाय और वे हमारे ही पक्ष में रहते हुए ठीक तरह से युद्ध करें। जिससे हमारी विजय हो जाए, हमारा स्वार्थ सिद्ध हो जाए।
सम्बन्ध- द्रोणाचार्य के पास जाकर दुर्योधन क्या वचन बोला- इसको आगे के श्लोक में बताते हैं।
 
पश्यैतां पाण्डुपुत्राणामाचार्य महतीं चमूम् । 
व्यूढां द्रुपदपुत्रेण तव शिष्येण धीमता।। 3 ।।

अर्थ- हे आचार्य ! आपके बुद्धिमान शिष्य द्रुपद पुत्र धृष्टद्युम्न के द्वारा व्यूह रचना से खड़ी की हुई पांडवों की इस बड़ी भारी सेना को देखिए।

व्याख्या- ‘आचार्य’- द्रोण के लिए ‘आचार्य’ संबोधन देने में दुर्योधन का यह भाव मालूम देता है कि आप हम सब के- कौरवों और पांडवों के आचार्य हैं। शस्त्रविद्या सिखाने वाले होने से आप सब के गुरु हैं। इसलिए आपके मन में किसी का पक्ष या आग्रह नहीं होना चाहिए।
‘तव शिष्येण धीमता’- इन पदों का प्रयोग करने में दुर्योधन का भाव यह है कि आप इतने सरल हैं कि अपने मारने के लिए पैदा होने वाले धृष्टद्युम्न को भी आपने अश्त्र-शस्त्र की विद्या सिखायी है; और वह आपका शिष्य धृष्टद्युम्न इतना बुद्धिमान है कि उसने आपको मारने के लिए आपसे ही अस्त्र-शस्त्र की विद्या सीखी है।
‘द्रुपदपुत्रेण’- यह पद कहने का आशय है कि आपको मारने के उद्देश्य को लेकर ही द्रुपद ने याज को उपयाज नामक ब्राह्मणों से यज्ञ कराया, जिससे धृष्टद्युम्न पैदा हुआ। वही यह द्रुपद पुत्र धृष्टद्युम्न आपके सामने सेनापति के रूप में खड़ा है।

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    उसके बाद दुर्योधन ने अपनी सेना के मुख्य-मुख्य योद्धाओं के नाम लेकर उनके रण कौशल आदि की प्रशंसा की। दुर्योधन को प्रसन्न करने के लिए भीष्मजी ने जोर से शंख बजाया। उसको सुनकर कौरव सेना में शंख आदि बाजे बज उठे। फिर चौदहवें श्लोक से उन्नीसवें श्लोक तक ‘पाण्डवाः’ पद का उत्तर देंगे कि रथ में बैठे हुए पाण्डवपक्षीय भगवान श्रीकृष्ण ने शंख बजाया। उसके बाद अर्जुन, भीम, युधिष्ठिर, नकुल, सहदेव आदि ने अपने-अपने शंख बजाये, जिससे दुर्योधन की सेना का हृदय दहल गया। उसके बाद भी संजय पाण्डवों की बात कहते-कहते बीसवें श्लोक से श्रीकृष्ण और अर्जुन के संवाद का प्रसंग आरंभ कर देंगे।]
‘किमकुर्वत’- ‘किम्’ शब्द के तीन अर्थ होते हैं- विकल्प, निन्दा और प्रश्न। युद्ध हुआ कि नहीं? इस तरह का विकल्प तो यहाँ लिया नहीं जा सकता; क्योंकि दस दिन तक युद्ध हो चुका है, और भीष्मजी को रथ से गिरा देने के बाद संजय हस्तिनापुर आकर धृतराष्ट्र को वहाँ की घटना सुना रहे हैं। ‘मेरे और पांडु के पुत्रों ने यह क्या किया, जो कि युद्ध कर बैठे! उनको युद्ध नहीं करना चाहिए था’- ऐसी निन्दा या आक्षेप भी यहां नहीं लिया जा सकता; क्योंकि युद्ध तो चल ही रहा था और धृतराष्ट्र के भीतर भी आक्षेपपूर्वक पूछने का भाव नहीं था।
यहाँ ‘किम्’ शब्द का अर्थ प्रश्न लेना ही ठीक बैठता है। धृतराष्ट्र, संजय से भिन्न-भिन्न प्रकार की छोटी-बड़ी सब घटनाओं को अनुक्रम से विस्तारपूर्वक ठीक-ठीक जानने के लिए ही प्रश्न कर रहे हैं।
सम्बन्ध- धृतराष्ट्र के प्रश्न का उत्तर संजय आगे के श्लोक से देना आरंभ करते हैं।

सञ्जय उवाच
दृष्टवा तु पाण्डवानीकं व्यूढं दुर्योधनस्तदा ।
आचार्यमुपसंगम्य राजा वचनमब्रवीत् ।। 2 ।।

अर्थ- संजय बोले- उस समय वज्रव्यूह- से खड़ी हुई पाण्डव-सेना को देखकर राजा दुर्योधन, द्रोणाचार्य के पास जाकर यह वचन बोला।

व्याख्या- ‘तदा’- जिस समय दोनों सेनाएँ युद्ध के लिए खड़ी हुई थीं, उस समय की बात संजय यहाँ ‘तदा’ पद से कहते हैं। कारण कि धृतराष्ट्र का प्रश्न ‘युद्ध की इच्छा वाले मेरे और पांडु के पुत्रों ने क्या किया’- इस विषय को सुनने के लिए ही है। ‘तु’- धृतराष्ट्र ने अपने और पांडु के पुत्रों के विषय में पूछा है। अतः संजय भी पहले धृतराष्ट्र के पुत्रों की बात बताने के लिए यहाँ ‘तु’ पद का प्रयोग करते हैं। ‘दृष्टवा पाण्डवानीकं व्यूढम्’ – पाण्डवों की वज्रव्यूह से खड़ी सेना को देखने का तात्पर्य है कि पाण्डवों की सेना बड़ी ही सुचारू रूप से और एक ही भाव से खड़ी थी अर्थात उनके सैनिकों में दो भाव नहीं थे, मतभेद नहीं था। उनके पक्ष में धर्म और भगवान श्रीकृष्ण थे। जिसके पक्ष में धर्म और भगवान होते हैं, उसका दूसरों पर बड़ा असर पड़ता है। इसलिए संख्या में कम होने पर भी पाण्डवों की सेना का तेज था और उसका दूसरों पर बड़ा असर पड़ता था। अतः पाण्डव सेना का दुर्योधन पर भी बड़ा असर पड़ा, जिससे वह द्रोणाचार्य के पास जाकर नीतियुक्त गंभीर वचन बोलता है। ‘राजा दुर्योधनः’- दुर्योधन को राजा कहने का तात्पर्य है कि धृतराष्ट्र का सबसे अधिक अपनापन दुर्योधन में ही था। परंपरा की दृष्टि से भी युवराज दुर्योधन ही था। राज्य के सब कार्यों की देखभाल दुर्योधन ही करता था। धृतराष्ट्र तो नाममात्र के राजा थे। युद्ध होने में भी मुख्य हेतु दुर्योधन ही था। इन सभी कारणों से संजय ने दुर्योधन के लिए ‘राजा’ शब्द का प्रयोग किया है। ‘आचार्यमुपसंगम्य’- द्रोणाचार्य के पास जाने में मुख्यतः तीन कारण मालूम देते हैं। -

1 . अपना स्वार्थ सिद्ध करने के लिए अर्थात द्रोणाचार्य के भीतर पाण्डवों के प्रति द्वेष पैदा करके उनको अपने पक्ष में विशेषता से करने के लिए दुर्योधन द्रोणाचार्य के पास गया।

2 . व्यवहार में गुरु के नाते आदर देने के लिए द्रोणाचार्य के पास जाना उचित था।

3 . मुख्य व्यक्ति का सेना में यथा स्थान खड़े रहना बहुत आवश्यक होता है, अन्यथा व्यवस्था बिगड़ जाती है। इसलिए दुर्योधन का द्रोणाचार्य के पास खुद जाना उचित ही था।

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शनिवार, 6 अगस्त 2016

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तब मजबूर होकर पाण्डवों ने भी युद्ध करना स्वीकार किया है। इस प्रकार मेरे पुत्र और पाण्डुपुत्र- दोनों ही सेनाओं के सहित युद्ध की इच्छा से इकट्टे हुए हैं। दोनों सेनाओं में युद्ध की इच्छा रहने पर भी दुर्योधन में युद्ध की इच्छा विशेष रूप से थी। उसका मुख्य उद्देश्य राज्य प्राप्ति का ही था। वह राज्य प्राप्ति धर्म से हो चाहे अधर्म से, न्याय से हो चाहे अन्याय से, विहित रीति से हो चाहे निषिद्ध रीति से, किसी भी तरह से हमें राज्य मिलना चाहिये- ऐसा उसका भाव था। इसलिए विशेषरूप से दुर्योधन का पक्ष ही युयुत्सु अर्थात युद्ध की इच्छा वाला था। पाण्डवों में धर्म की मुख्यता थी। उनका ऐसा भाव था कि हम चाहे जैसा जीवन-निर्वाह कर लेंगे, पर अपने धर्म में बाधा नहीं आने देंगे, धर्म के विरुद्ध नहीं चलेंगे। इस बात को लेकर महाराज युधिष्ठिर युद्ध नहीं करना चाहते थे। परंतु जिस माँ की आज्ञा से युधिष्ठिर ने चारों भाइयों सहित द्रौपदी से विवाह किया था, उस माँ की आज्ञा होने के कारण ही महाराज युधिष्ठिर की युद्ध में प्रवृत्ति हुई थी अर्थात केवल माँ के आज्ञा पालन रूप धर्म से ही युधिष्ठिर युद्ध की इच्छा वाले हुए हैं।
तात्पर्य है कि दुर्योधन आदि तो राज्य को लेकर ही युयुत्सु थे, पर पाण्डव धर्म को लेकर ही युयुत्सु बने थे। ‘मामकाः पाण्डवाश्चैव’- पाण्डव धृतराष्ट्र को पिता के समान समझते थे और उनकी आज्ञा का पालन करते थे। धृतराष्ट्र द्वारा अनुचित आज्ञा देने पर भी पाण्डव उचित-अनुचित का विचार न करके उनकी आज्ञा का पालन करते थे। अतः यहाँ ‘मामकाः’ पद के अंतर्गत कौरव और पाण्डव दोनों आ जाते हैं। फिर भी ‘पाण्डवाः’ पद अलग देने का तात्पर्य है कि धृतराष्ट्र का अपने पुत्रों में तथा पाण्डु पुत्रों में समान भाव नहीं था। उनमें पक्षपात था, अपने पुत्रों के प्रति मोह था। वे दुर्योधन आदि को तो अपना मानते थे, पर पाण्डवों को अपना नहीं मानते थे। इस कारण उन्होंने अपने पुत्रों के लिए ‘मामकाः’ और पाण्डुपुत्रों के लिए ‘पाण्डवाः’ पद का प्रयोग किया है; क्योंकि जो भाव भीतर होते हैं, वे ही प्रायः वाणी से बाहर निकलते हैं। इस द्वैधीभाव के कारण ही धृतराष्ट्र को अपने कुल के संहार का दुःख भोगना पड़ा।
इससे मनुष्य मात्र को यह शिक्षा लेनी चाहिए कि वह अपने घरों में, मुहल्लों में, गाँवों में, प्रांतों में, देशों में, सम्प्रदायों में द्वैधीभाव अर्थात ये अपने हैं, ये दूसरे हैं- ऐसा भाव न रखे। कारण कि द्वैधीभाव से आपस में प्रेम स्नेह नहीं होता प्रत्युत कलह होती है। यहाँ ‘पाण्डवाः’ पद के साथ ‘एव’ पद देने का तात्पर्य है कि पाण्डव तो बड़े धर्मात्मा हैं; अतः उन्हें युद्ध नहीं करना चाहिये था। परंतु वे भी युद्ध के लिए रणभूमि में आ गए तो वहाँ आकर उन्होंने क्या किया?
‘मामकाः’ और ‘पाण्डवाः’ इनमें से पहले ‘मामकाः’ पद का उत्तर संजय आगे के श्लोक से तेरहवें श्लोक तक देंगे कि आपके पुत्र दुर्योधन ने पाण्डवों की सेना को देखकर द्रोणाचार्य के मन में पाण्डवों के प्रति द्वेष पैदा करने के लिए उनके पास जाकर पाण्डवों के मुख्य-मुख्य सेनापतियों के नाम लिये।

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शुक्रवार, 5 अगस्त 2016

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 🌹🔱🔅श्रीमद्भगवद्गीता🔅🔱🌹

🌹श्रीमद्भगवद्गीता :
🌹साधक-संजीवनी :
🌹प्रथम अध्याय :

धृतराष्ट्र उवाच :

धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः।
मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत सञ्जय।। 1 ।।

अर्थ- धृतराष्ट्र बोले- हे सञ्जय ! धर्मभूमि कुरुक्षेत्र में युद्ध की इच्छा से इकट्ठे हुए मेरे और पांडु के पुत्रों ने भी क्या किया?

व्याख्या- ‘धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे’- कुरुक्षेत्र में देवताओं ने यज्ञ किया था। राजा कुरु ने भी यहाँ तपस्या की थी। यज्ञादि धर्ममय कार्य होने से तथा राजा कुरु की तपस्याभूमि होने से इसको धर्मभूमि कुरुक्षेत्र कहा गया है। यहाँ ‘धर्मक्षेत्रे’ और ‘कुरुक्षेत्रे’ पदों में ‘क्षेत्र’ शब्द देने में धृतराष्ट्र का अभिप्राय है कि यह अपनी कुरुवंशियों की भूमि है। यह केवल लड़ाई की भूमि ही नहीं है, प्रत्युत तीर्थभूमि भी है, जिसमें प्राणी जीते-जी पवित्र कर्म करके अपना कल्याण कर सकते हैं। इस तरह लौकिक और पारलौकिक सब तरह का लाभ हो जाय- ऐसा विचार करके एवं श्रेष्ठ पुरुषों की सम्मति लेकर ही युद्ध के लिए यह भूमि चुनी गयी है। संसार में प्रायः तीन बातों को लेकर लड़ाई होती है- भूमि, धन और स्त्री। इन तीनों में भी राजाओं का आपस में लड़ना मुख्यतः जमीन को लेकर होता है। यहाँ ‘कुरुक्षेत्रे’ पद देने का तात्पर्य भी जमीन को लेकर लड़ने में है। कुरुवंश में धृतराष्ट्र और पाण्डु के पुत्र सब एक हो जाते हैं। कुरुवंशी होने से दोनों का कुरुक्षेत्र में अर्थात राजा कुरु की जमीन पर समान हक लगता है। इसलिए दोनों जमीन के लिए लड़ाई करने आए हुए हैं।
यद्यपि अपनी भूमि होने के कारण दोनों के लिए ‘कुरुक्षेत्रे’ पद देना युक्तिसंगत, न्यायसंगत है, तथापि हमारी सनातन वैदिक संस्कृति ऐसी विलक्षण है कि कोई भी कार्य करना होता है, तो वह धर्म को सामने रखकर ही होता है। युद्ध-जैसा कार्य भी धर्मभूमि- तीर्थभूमि में ही करते हैं, जिससे युद्ध में मरने वालों का उद्धार हो जाय, कल्याण हो जाय। अतः यहाँ कुरुक्षेत्र के साथ ‘धर्मक्षेत्रे’ पद आया है। यहाँ आरम्भ में ‘धर्म’ पद से एक और बात भी मालूम होती है। अगर आरम्भ के ‘धर्म’ पद में से ‘धर्’ लिया जाए और अठारहवें अध्याय के अंतिम श्लोक के ‘मम’ पद में से ‘म’ लिया जाए, तो ‘धर्म’ शब्द बन जाता है। अतः सम्पूर्ण गीता धर्म के अंतर्गत है, अर्थात धर्म का पालन करने से गीता के सिद्धांतों का पालन हो जाता है और गीता के सिद्धान्तों के अनुसार कर्तव्य-कर्म करने से धर्म का अनुष्ठान हो जाता है। इन ‘धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे’ पदों से सभी मनुष्यों को यह शिक्षा लेनी चाहिए कि कोई भी काम करना हो तो वह धर्म को सामने रखकर ही करना चाहिए। प्रत्येक कार्य सबके हित की दृष्टि से ही करना चाहिए, केवल अपने सुख-आराम की दृष्टि से नहीं; और कर्तव्य-अकर्तव्य के विषय में शास्त्र को सामने रखना चाहिए। ‘समवेता युयुत्सवः’- राजाओं के द्वारा बार-बार सन्धि का प्रस्ताव रखने पर भी दुर्योधन ने सन्धि करना स्वीकार नहीं किया। इतना ही नहीं, भगवान श्रीकृष्ण के कहने पर भी मेरे पुत्र दुर्योधन ने स्पष्ट कह दिया कि बिना युद्ध के मैं तीखी सूई की नोक-जितनी जमीन भी पांडवों को नहीं दूँगा।

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बुधवार, 3 अगस्त 2016

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 🌹🔱🔅श्रीमद्भगवद्गीता🔅🔱🌹

🌹श्रीमद्भगवद्गीता :
🌹 साधक-संजीवनी हिन्दी-टीका :
🌹अवतरणिका :

पांडवों ने बारह वर्ष का वनवास और एक वर्ष का अज्ञातवास समाप्त होने पर जब प्रतिज्ञा के अनुसार अपना आधा राज्य माँगा, तब दुर्योधन ने आधा राज्य तो क्या, तीखी सूई की नोक-जितनी जमीन भी बिना युद्ध के देनी स्वीकार नहीं की। अतः पांडवों ने माता कुंती की आज्ञा के अनुसार युद्ध करना स्वीकार कर लिया। इस प्रकार पाण्डवों और कौरवों का युद्ध होना निश्चित हो गया और तदनुसार दोनों ओर से युद्ध की तैयारी होने लगी। महर्षि वेदव्यास जी का धृतराष्ट्र पर बहुत स्नेह था। उस स्नेह के कारण उन्होंने धृतराष्ट्र के पास आकर कहा कि ‘युद्ध होना और उसमें क्षत्रियों का महान संहार होना अवश्यम्भावी है, इसे कोई टाल नहीं सकता। यदि तुम युद्ध देखना चाहते हो तो मैं तुम्हें दिव्य दृष्टि दे सकता हूँ, जिसमें तुम यहीं बैठे-बैठे युद्ध को अच्छी तरह से देख सकते हो।’ इस पर धृतराष्ट्र ने कहा कि ‘मैं जन्मभर अन्धा रहा, अब अपने कुल के संहार को मैं दखना नहीं चाहता; परंतु युद्ध कैसे हो रहा है- यह समाचार जरूर सुनना चाहता हूँ।’ तब व्यासजी ने कहा कि ‘मैं संजय को दिव्य दृष्टि देता हूँ, जिससे यह सम्पूर्ण युद्ध को, सम्पूर्ण घटनाओं को, सैनिकों के मन में आयी हुई बातों को भी जान लेगा, सुन लेगा, देख लेगा और सब बातें तुम्हें सुना भी देगा ।’ ऐसा कहकर व्यास जी ने संजय को दिव्य दृष्टि प्रदान की।
निश्चित समय के अनुसार कुरुक्षेत्र में युद्ध आरम्भ हुआ। दस दिन तक संजय युद्ध-स्थल में ही रहे। जब पितामह भीष्म बाणों के द्वारा रथ से गिरा दिए गये, तब संजय ने हस्तिनापुर में (जहाँ धृतराष्ट्र विराजमान थे) आकर धृतराष्ट्र को यह समाचार सुनाया। इस समाचार को सुनकर धृतराष्ट्र को बड़ा दुःख हुआ और वे विलाप करने लगे। फिर उन्होंने संजय से युद्ध का सारा वृत्तान्त सुनाने के लिए कहा। भीष्म पर्व के चौबीसवें अध्याय तक संजय ने युद्ध –संबंधी बातें धृतराष्ट्र को सुनायी। 25वें अध्याय के आरंभ में धृतराष्ट्र संजय से पूछते हैं।

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