बुधवार, 7 सितंबर 2016

🚩🔱 ❄ «ॐ»«ॐ»«ॐ» ❄ 🔱🚩

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  🌹🌟 राधे नाम संग हरि बोल 🌟🌹
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 🌹🔱🔅श्रीमद्भगवद्गीता🔅🔱🌹

🌹 श्रीमद्भगवद्गीता :
🌹 साधक-संजीवनी :
🌹 प्रथम अध्याय :

( गत ब्लाग से आगे )

संबंध- अब संजय आगे के चार श्लोकों में पूर्व श्लोक का खुलासा करते हुए दूसरों के शंखवादन का वर्णन करते हैं।

पाञ्चजन्यं हृषीकेशो देवदत्तं धनञ्जयः।
पौंड्र दध्मौ महाशंख भीमकर्मा वृकोदरः।। 15 ।।

अर्थ- अंतर्यामी भगवान श्रीकृष्ण ने पाञ्चजन्य नामक तथा धनञ्जय अर्जुन ने देवदत्त नामक शंख बजाया; और भयानक कर्म करने वाले वृकोदर भीम ने पौंड्र नामक महाशंख बजाया।

व्याख्या- ‘पाञ्यजन्यं हृषीकेशः’- सबके अन्तर्यामी अर्थात सबके भीतर की बात जाने वाले साक्षात भगवान श्रीकृष्ण ने पाण्डवों के पक्ष में खड़े होकर ‘पाञ्चजन्य’ नामक शंख बजाया। भगवान पंचजन नामक शंख रुपधारी दैत्य को मारकर उसको शंखरुप से ग्रहण किया था, इसलिए इस शंख का नाम ‘पाञ्चजन्य’ हो गया।

देवदत्तं धनञ्जयः- राजसूय यज्ञ के समय अर्जुन ने बहुत से राजाओं को जीतकर बहुत धन इकट्ठा किया था। इस करण अर्जुन का नाम ‘धनञ्जय’ पड़ गया। निवातकवचादि दैत्यों के साथ युद्ध करते समय इंद्र ने अर्जुन को ‘देवदत्त’ नामक शंख दिया था। इस शंख की ध्वनि बड़े जोर से होती थी, जिससे शत्रुओं की सेना घबरा जाती थी। इस शंख को अर्जुन ने बजाया। ‘पौंड्र दध्मौ महाशंख भीमकर्ता वृकोदरः’- हिडिम्बासुर, बकासुर, जटासुर आदि असुरों तथा कीचक, जरासन्ध आदि बलवान वीरों को मारने के कारण भीमसेन का नाम ‘भीमकर्मा’ पड़ गया। उनके पेट में जठराग्नि के सिवाय ‘वृक’ नाम की एक विशेष अग्नि थी, जिससे बहुत अधिक भोजन पचता था। इस कारण उनका नाम ‘वृकोदर’ पड़ गया। ऐसे भीमकर्मा वृकोदर भीमसेन ने बहुत बड़े आकार वाला ‘पौंड्र’ नामक शंख बजाया।

 अनन्तविजयं राजा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः।
नकुलः सहदेवश्च सुघोषमणिपुष्पकौ।। 16 ।।

अर्थ- कुंती पुत्र राजा युधिष्ठिर ने अनन्तविजय नामक शंख बजाया तथा नकुल और सहदेव ने सुघोष और मणिपुष्पक नामक शंख बजाये।

व्याख्या- ‘अनन्तविजयं राजा....... सुघोषमणि पुष्पकौ’- अर्जुन, भीम और युधिष्ठिर- ये तीनों कुंती के पुत्र हैं तथा नकुल और सहदेव- ये दोनों माद्री के पुत्र हैं, यह विभाग दिखाने के लिए ही यहाँ युधिष्ठिर के लिए ‘कुंतीपुत्र’ विशेषण दिया गया है। युधिष्ठिर को राजा कहने का तात्पर्य है कि युधिष्ठिर जी वनवास के पहले अपने आधे राज्य के राजा थे, और नियम के अनुसार बारह वर्ष वनवास और एक वर्ष अज्ञातवास के बाद वे राजा होने चाहिए थे। ‘राजा’ विशेषण देकर संजय यह भी संकेत करना चाहते हैं कि आगे चलकर धर्मराज युद्धिष्ठिर ही संपूर्ण पृथ्वीमंडल के राजा होंगे।

( शेष आगे के ब्लाग में )

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