🚩🔱 ❄ «ॐ»«ॐ»«ॐ» ❄ 🔱🚩
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🌹🌟 राधे नाम संग हरि बोल 🌟🌹
※❖ॐ∥▩∥श्री∥ஜ ۩۞۩ ஜ∥श्री∥▩∥ॐ❖※
🌹🔱🔅श्रीमद्भगवद्गीता🔅🔱🌹
🌹 श्रीमद्भगवद्गीता :
🌹 साधक-संजीवनी :
🌹 प्रथम अध्याय :
( गत ब्लाग से आगे )
कविध्वजः- अर्जुन के लिये ‘कपिध्वज’ विशेषण देकर संजय धृतराष्ट्र को अर्जुन के रथ की ध्वजा पर विराजमान हनुमान जी का स्मरण कराते हैं। जब पांडव वन में रहते थे, तब एक दिन अकस्मात वायु ने एक दिव्य सहस्र दल कमल लाकर द्रौपदी के सामने डाल दिया। उसे देखकर द्रौपदी बहुत प्रसन्न हो गयी और उससे भीमसेन से कहा कि ‘वीरवर!’ आप ऐसे बहुत से कमल ला दीजिये। द्रौपदी की इच्छा पूर्ण करने के लिये भीमसेन वहाँ से चल पड़े। जब वे कदलीवन में पहुँचे, तब वहाँ उनकी हनुमान जी से भेंट हो गयी। उन दोनों की आपस में कई बातें हुईं। अंत में हनुमान जी ने भीमसेन से वरदान मांगने के लिए आग्रह किया तो भीमसेन ने कहा कि ‘मेरे पर आपकी कृपा बनी रहे’। इस पर हनुमान जी ने कहा कि ‘हे वायु पुत्र! जिस समय तुम बाण और शक्ति के आघात से व्याकुल शत्रुओं की सेना में घुसकर सिंहनाद करोगे, उस समय मैं अपनी गर्जना से उस सिंहनाद और बढ़ा दूँगा। इसके सिवाय अर्जुन के रथ की ध्वजा पर बैठकर मैं ऐसी भयंकर गर्जना किया करूँगा, जो शत्रुओं को सुगमता से मार सकोगे।’ इस प्रकार जिनके रथ की ध्वजा पर हनुमान जी विराजमान हैं, विजय निश्चित है।
पांडवः- धृतराष्ट्र ने अपने प्रश्न में ‘पांडवाः’ पद का प्रयोग किया था। अतः धृतराष्ट्र को बार-बार पांडवों की याद दिलाने के लिये संजय ‘पांडवः’ शब्द का प्रयोग करते हैं।
हृषीकेशं तदा वाक्यमिदमाह महीपते- पांडव सेना को देखकर दुर्योधन तो गुरु द्रोणाचार्य के पास जाकर चालाकी से भरे हुए वचन बोलता है; परन्तु अर्जुन कौरव सेना को देखकर जो जगद्गुरु अंतर्यामी हैं, मन-बुद्धि आदि के प्रेरक हैं- ऐसे भगवान श्रीकृष्ण से शूरवीरता, उत्साह और अपने कर्तव्य से भरे हुए वचन बोलते हैं।
( शेष आगे के ब्लाग में )
※❖ॐ∥▩∥श्री∥ஜ ۩۞۩ ஜ∥श्री∥▩∥ॐ❖※
🌹۞☀∥ राधेकृष्ण: शरणम् ∥☀۞🌹
※❖ॐ∥▩∥श्री∥ஜ ۩۞۩ ஜ∥श्री∥▩∥ॐ❖※
🌹: कृष्णा : श्री राधा प्रेमी : 🌹
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पांडवः- धृतराष्ट्र ने अपने प्रश्न में ‘पांडवाः’ पद का प्रयोग किया था। अतः धृतराष्ट्र को बार-बार पांडवों की याद दिलाने के लिये संजय ‘पांडवः’ शब्द का प्रयोग करते हैं।
हृषीकेशं तदा वाक्यमिदमाह महीपते- पांडव सेना को देखकर दुर्योधन तो गुरु द्रोणाचार्य के पास जाकर चालाकी से भरे हुए वचन बोलता है; परन्तु अर्जुन कौरव सेना को देखकर जो जगद्गुरु अंतर्यामी हैं, मन-बुद्धि आदि के प्रेरक हैं- ऐसे भगवान श्रीकृष्ण से शूरवीरता, उत्साह और अपने कर्तव्य से भरे हुए वचन बोलते हैं।
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