शनिवार, 13 अगस्त 2016

🚩🔱 ❄ «ॐ»«ॐ»«ॐ» ❄ 🔱🚩

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  🌹🌟 राधे नाम संग हरि बोल 🌟🌹
 ※❖ॐ∥▩∥श्री∥ஜ ۩۞۩ ஜ∥श्री∥▩∥ॐ❖※

 🌹🔱🔅श्रीमद्भगवद्गीता🔅🔱🌹

🌹 श्रीमद्भगवद्गीता :
🌹 साधक-संजीवनी :
🌹 प्रथम अध्याय :

( गत ब्लाग से आगे )

संबंध- द्रोणाचार्य के मन में पांडवों के प्रति द्वेष पैदा करने और युद्ध के लिए जोश दिलाने के लिए दुर्योधन ने पांडव सेना की विशेषता बतायी। दुर्योधन के मन में विचार आया कि द्रोणाचार्य पांडवों के पक्षपाती हैं ही; अतः वे पांडव सेना की महत्ता सुनकर मेरे को यह कह सकते हैं कि जब पांडवों की सेना में इतनी विशेषता है, तो उनके साथ तू संधि क्यों नही कर लेता? ऐसा विचार आते ही दुर्योधन आगे के तीन श्लोकों में अपनी सेना की विशेषता बताता है।

अस्माकं तु विशिष्टा ये तान्निबोध द्विजोत्तम ।
नायका मम सैन्यस्य संज्ञार्थं तान्ब्रवीमि ते ।। 7 ।।

अर्थ- हे द्विजोत्तम! हमारे पक्ष में भी जो मुख्य हैं, उन पर भी आप ध्यान दीजिये। आपको याद दिलाने के लिये मेरी सेना के जो नायक हैं, उनको मैं कहता हूँ।

व्याख्या- ‘अस्मांक तु विशिष्टा ये तान्निबोध द्विजोत्तम’- दुर्योधन द्रोणाचार्य से कहता है कि हे द्विजश्रेष्ठ! जैसे पांडवों की सेना में श्रेष्ठ महारथी हैं, ऐसे ही हमारी सेना में भी उनसे कम विशेषता वाले महारथी नहीं हैं, प्रत्युत उनकी सेना के महारथियों की अपेक्षा ज्यादा ही विशेषता रखने वाले हैं। उनको भी आप समझ लीजिये। तीसरे श्लोक में ‘पश्य’ और यहाँ ‘निबोध’ क्रिया देने का तात्पर्य है कि पांडवों की सेना तो सामने खड़ी है, इसलिये उसको देखने के लिये दुर्योधन ‘पश्य’ क्रिया का प्रयोग करता है। परंतु अपनी सेना सामने नहीं है अर्थात अपनी सेना की तरफ द्रोणाचार्य की पीठ है, इसलिये उसको देखने की बात न कहकर उस पर ध्यान देने के लिये दुर्योधन ‘निबोध’ क्रिया का प्रयोग करता है।
‘नायका मम सैन्यस्य संज्ञार्थ तान्ब्रवीमि ते’- मेरी सेना में भी जो विशिष्ट-विशिष्ट सेनापति हैं, सेनानायक हैं, महारथी हैं, मैं उनके नाम केवल आपको याद दिलाने के लिये, आपकी दृष्टि उधर खींचने के लिये ही कह रहा हूँ।
‘संज्ञार्थम्’ पद का तात्पर्य है कि हमारे बहुत से सेना नायक हैं, उनके नाम मैं कहाँ तक कहूँ; इसलिये मैं उनका केवल संकेतमात्र करता हूँ; क्योंकि आप तो सबको जानते ही हैं। इस श्लोक में दुर्योधन का ऐसा भाव प्रतीत होता है कि हमारा पक्ष किसी भी तरह कमजोर नहीं है। परंतु राजनीति के अनुसार शत्रुपक्ष चाहे कितना ही कमजोर हो और अपना पक्ष चाहे कितना ही सबल हो, ऐसी अवस्था में भी शत्रुपक्ष को कमजोर नहीं समझना चाहिये और अपने में उपेक्षा, उदासीनता आदि की भावना किश्चिन्मात्र भी नहीं आने देनी चाहिये।
इसलिये सावधानी के लिये मैंने उसकी सेना की बात कही और अब अपनी सेना की बात कहता हूँ। दूसरा भाव यह है कि पांडवों की सेना को देखकर दुर्योधन पर बड़ा प्रभाव पड़ा और उसके मन में कुछ भय भी हुआ। कारण कि संख्या में कम होते हुये भी पांडव के पक्ष में बहुत से धर्मात्मा पुरुष थे और स्वयं भगवान थे। जिस पक्ष में धर्म और भगवान रहते हैं, उसका सब पर बड़ा प्रभाव पड़ता है। पापी-से-पापी, दुष्ट-से-दुष्ट व्यक्ति पर भी उसका प्रभाव पड़ता है। इतना ही नहीं, पशु-पक्षी, वृक्ष-लता आदि पर भी उसका प्रभाव पड़ता है। कारण कि धर्म और भगवान नित्य हैं। कितनी ऊँची-से-ऊँची भौतिक शक्तियाँ क्यों न हों, हैं वे सभी अनित्य ही। इसलिये दुर्योधन पर पांडव सेना का बड़ा असर पड़ा। परंतु उसके भीतर भौतिक बल का विश्वास मुख्य होने से वह द्रोणाचार्य को विश्वास दिलाने के लिये कहता है कि हमारे पक्ष में जितनी विशेषता है, उतनी पांडवों की सेना में नहीं है। अतः हम उन पर सहज ही विजय कर सकते हैं।

( शेष आगे के ब्लाग में )

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