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🌹🌟 राधे नाम संग हरि बोल 🌟🌹
※❖ॐ∥▩∥श्री∥ஜ ۩۞۩ ஜ∥श्री∥▩∥ॐ❖※
🌹🔱🔅श्रीमद्भगवद्गीता🔅🔱🌹
🌹 श्रीमद्भगवद्गीता :
🌹 साधक-संजीवनी :
🌹 प्रथम अध्याय :
( गत ब्लाग से आगे )
संबंध- धृतराष्ट्र ने पहले श्लोक में अपने और पांडु के पुत्रों के विषय में प्रश्न किया था। उसका उत्तर संजय ने दूसरे श्लोक से उन्नीसवें श्लोक तक दे दिया। अब संजय भगवद्गीता के प्राकट्य का प्रसंग आगे के श्लोक से आरंभ करते हैं।
अथ व्यवस्थितान्दृष्टवा धार्तराष्ट्रान् कपिध्वजः ।
प्रवृत्ते शस्त्रसंपाते धनुरुद्यम्य पांडवः ।। 20 ।।
अर्थ- हे महीपते धृतराष्ट्र! अब शस्त्रों के चलने की तैयारी हो रही थी कि उस समय अन्यायपूर्वक राज्य को धारण करने वाले राजाओं और उनके साथियों को व्यवस्थित रूप से सामने खड़े हुए देखकर कपिध्वज पांडु पुत्र अर्जुन ने अपना गांडीव धनुष उठा लिया और अंतर्यामी भगवान श्रीकृष्ण से ये वचन बोले।
व्याख्या- ‘अथ’- इस पद का तात्पर्य है कि अब संजय भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन के संवादरूप ‘भगवद्गीता’ का आरंभ करते हैं। अठारहवें अध्याय के चौहत्तरवें श्लोक में आए ‘इति’ पद से यह संवाद समाप्त होता है। ऐसे ही भगवद्गीता के उपदेश का आरंभ उसके दूसरे अध्याय के ग्यारहवें श्लोक से होता है और अठारहवें अध्याय के छाछठवें श्लोक में यह उपदेश समाप्त होता है।
प्रवृत्ते शस्त्रसंपाते- यद्यपि पितामह भीष्म ने युद्धारंभ की घोषणा के लिए शंख नहीं बजाया था, प्रत्युत केवल दुर्योधन को प्रसन्न करने के लिए ही शंख बजाया था, तथापि कौरव और पांडवसेना ने उसको युद्धारंभ की घोषणा ही मान लिया और अपने-अपने अस्त्र-शस्त्र हाथ में उठाकर तैयार हो गये। इस तरह सेना को शस्त्र उठाये देखकर वीरता में भरकर अर्जुन ने भी अपना गांडीव धनुष हाथ में उठा लिया।
व्यवस्थितान् धार्तराष्ट्रान् दृष्टा- इन पदों से संजय का तात्पर्य है कि जब आपके पुत्र दुर्योधन ने पांडवों की सेना को देखा, तब वह भागा-भागा द्रोणाचार्य के पास गया। परंतु जब अर्जुन ने कौरवों की सेना को देखा, तब उनका हाथ सीधे गांडीव धनुष पर ही गया- ‘धनुरुद्यम्य’। इससे मालूम होता है कि दुर्योधन के भीतर भय है कि और अर्जुन के भीतर निर्भयता है, उत्साह है, वीरता है।
( शेष आगे के ब्लाग में )
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🌹۞☀∥ राधेकृष्ण: शरणम् ∥☀۞🌹
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🌹: कृष्णा : श्री राधा प्रेमी : 🌹
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अथ व्यवस्थितान्दृष्टवा धार्तराष्ट्रान् कपिध्वजः ।
प्रवृत्ते शस्त्रसंपाते धनुरुद्यम्य पांडवः ।। 20 ।।
अर्थ- हे महीपते धृतराष्ट्र! अब शस्त्रों के चलने की तैयारी हो रही थी कि उस समय अन्यायपूर्वक राज्य को धारण करने वाले राजाओं और उनके साथियों को व्यवस्थित रूप से सामने खड़े हुए देखकर कपिध्वज पांडु पुत्र अर्जुन ने अपना गांडीव धनुष उठा लिया और अंतर्यामी भगवान श्रीकृष्ण से ये वचन बोले।
व्याख्या- ‘अथ’- इस पद का तात्पर्य है कि अब संजय भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन के संवादरूप ‘भगवद्गीता’ का आरंभ करते हैं। अठारहवें अध्याय के चौहत्तरवें श्लोक में आए ‘इति’ पद से यह संवाद समाप्त होता है। ऐसे ही भगवद्गीता के उपदेश का आरंभ उसके दूसरे अध्याय के ग्यारहवें श्लोक से होता है और अठारहवें अध्याय के छाछठवें श्लोक में यह उपदेश समाप्त होता है।
प्रवृत्ते शस्त्रसंपाते- यद्यपि पितामह भीष्म ने युद्धारंभ की घोषणा के लिए शंख नहीं बजाया था, प्रत्युत केवल दुर्योधन को प्रसन्न करने के लिए ही शंख बजाया था, तथापि कौरव और पांडवसेना ने उसको युद्धारंभ की घोषणा ही मान लिया और अपने-अपने अस्त्र-शस्त्र हाथ में उठाकर तैयार हो गये। इस तरह सेना को शस्त्र उठाये देखकर वीरता में भरकर अर्जुन ने भी अपना गांडीव धनुष हाथ में उठा लिया।
व्यवस्थितान् धार्तराष्ट्रान् दृष्टा- इन पदों से संजय का तात्पर्य है कि जब आपके पुत्र दुर्योधन ने पांडवों की सेना को देखा, तब वह भागा-भागा द्रोणाचार्य के पास गया। परंतु जब अर्जुन ने कौरवों की सेना को देखा, तब उनका हाथ सीधे गांडीव धनुष पर ही गया- ‘धनुरुद्यम्य’। इससे मालूम होता है कि दुर्योधन के भीतर भय है कि और अर्जुन के भीतर निर्भयता है, उत्साह है, वीरता है।
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