🚩🔱 ❄ «ॐ»«ॐ»«ॐ» ❄ 🔱🚩
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🌹🌟 राधे नाम संग हरि बोल 🌟🌹
※❖ॐ∥▩∥श्री∥ஜ ۩۞۩ ஜ∥श्री∥▩∥ॐ❖※
🌹🔱🔅श्रीमद्भगवद्गीता🔅🔱🌹
🌹श्रीमद्भगवद्गीता :
🌹साधक-संजीवनी :
🌹प्रथम अध्याय :
धृतराष्ट्र उवाच :
धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः।
मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत सञ्जय।। 1 ।।
अर्थ- धृतराष्ट्र बोले- हे सञ्जय ! धर्मभूमि कुरुक्षेत्र में युद्ध की इच्छा से इकट्ठे हुए मेरे और पांडु के पुत्रों ने भी क्या किया?
व्याख्या- ‘धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे’- कुरुक्षेत्र में देवताओं ने यज्ञ किया था। राजा कुरु ने भी यहाँ तपस्या की थी। यज्ञादि धर्ममय कार्य होने से तथा राजा कुरु की तपस्याभूमि होने से इसको धर्मभूमि कुरुक्षेत्र कहा गया है। यहाँ ‘धर्मक्षेत्रे’ और ‘कुरुक्षेत्रे’ पदों में ‘क्षेत्र’ शब्द देने में धृतराष्ट्र का अभिप्राय है कि यह अपनी कुरुवंशियों की भूमि है। यह केवल लड़ाई की भूमि ही नहीं है, प्रत्युत तीर्थभूमि भी है, जिसमें प्राणी जीते-जी पवित्र कर्म करके अपना कल्याण कर सकते हैं। इस तरह लौकिक और पारलौकिक सब तरह का लाभ हो जाय- ऐसा विचार करके एवं श्रेष्ठ पुरुषों की सम्मति लेकर ही युद्ध के लिए यह भूमि चुनी गयी है। संसार में प्रायः तीन बातों को लेकर लड़ाई होती है- भूमि, धन और स्त्री। इन तीनों में भी राजाओं का आपस में लड़ना मुख्यतः जमीन को लेकर होता है। यहाँ ‘कुरुक्षेत्रे’ पद देने का तात्पर्य भी जमीन को लेकर लड़ने में है। कुरुवंश में धृतराष्ट्र और पाण्डु के पुत्र सब एक हो जाते हैं। कुरुवंशी होने से दोनों का कुरुक्षेत्र में अर्थात राजा कुरु की जमीन पर समान हक लगता है। इसलिए दोनों जमीन के लिए लड़ाई करने आए हुए हैं।
यद्यपि अपनी भूमि होने के कारण दोनों के लिए ‘कुरुक्षेत्रे’ पद देना युक्तिसंगत, न्यायसंगत है, तथापि हमारी सनातन वैदिक संस्कृति ऐसी विलक्षण है कि कोई भी कार्य करना होता है, तो वह धर्म को सामने रखकर ही होता है। युद्ध-जैसा कार्य भी धर्मभूमि- तीर्थभूमि में ही करते हैं, जिससे युद्ध में मरने वालों का उद्धार हो जाय, कल्याण हो जाय। अतः यहाँ कुरुक्षेत्र के साथ ‘धर्मक्षेत्रे’ पद आया है। यहाँ आरम्भ में ‘धर्म’ पद से एक और बात भी मालूम होती है। अगर आरम्भ के ‘धर्म’ पद में से ‘धर्’ लिया जाए और अठारहवें अध्याय के अंतिम श्लोक के ‘मम’ पद में से ‘म’ लिया जाए, तो ‘धर्म’ शब्द बन जाता है। अतः सम्पूर्ण गीता धर्म के अंतर्गत है, अर्थात धर्म का पालन करने से गीता के सिद्धांतों का पालन हो जाता है और गीता के सिद्धान्तों के अनुसार कर्तव्य-कर्म करने से धर्म का अनुष्ठान हो जाता है। इन ‘धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे’ पदों से सभी मनुष्यों को यह शिक्षा लेनी चाहिए कि कोई भी काम करना हो तो वह धर्म को सामने रखकर ही करना चाहिए। प्रत्येक कार्य सबके हित की दृष्टि से ही करना चाहिए, केवल अपने सुख-आराम की दृष्टि से नहीं; और कर्तव्य-अकर्तव्य के विषय में शास्त्र को सामने रखना चाहिए। ‘समवेता युयुत्सवः’- राजाओं के द्वारा बार-बार सन्धि का प्रस्ताव रखने पर भी दुर्योधन ने सन्धि करना स्वीकार नहीं किया। इतना ही नहीं, भगवान श्रीकृष्ण के कहने पर भी मेरे पुत्र दुर्योधन ने स्पष्ट कह दिया कि बिना युद्ध के मैं तीखी सूई की नोक-जितनी जमीन भी पांडवों को नहीं दूँगा।
( शेष आगे के ब्लाग में )
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🌹۞☀∥ राधेकृष्ण: शरणम् ∥☀۞🌹
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🌹: कृष्णा : श्री राधा प्रेमी : 🌹
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धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः।
मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत सञ्जय।। 1 ।।
अर्थ- धृतराष्ट्र बोले- हे सञ्जय ! धर्मभूमि कुरुक्षेत्र में युद्ध की इच्छा से इकट्ठे हुए मेरे और पांडु के पुत्रों ने भी क्या किया?
व्याख्या- ‘धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे’- कुरुक्षेत्र में देवताओं ने यज्ञ किया था। राजा कुरु ने भी यहाँ तपस्या की थी। यज्ञादि धर्ममय कार्य होने से तथा राजा कुरु की तपस्याभूमि होने से इसको धर्मभूमि कुरुक्षेत्र कहा गया है। यहाँ ‘धर्मक्षेत्रे’ और ‘कुरुक्षेत्रे’ पदों में ‘क्षेत्र’ शब्द देने में धृतराष्ट्र का अभिप्राय है कि यह अपनी कुरुवंशियों की भूमि है। यह केवल लड़ाई की भूमि ही नहीं है, प्रत्युत तीर्थभूमि भी है, जिसमें प्राणी जीते-जी पवित्र कर्म करके अपना कल्याण कर सकते हैं। इस तरह लौकिक और पारलौकिक सब तरह का लाभ हो जाय- ऐसा विचार करके एवं श्रेष्ठ पुरुषों की सम्मति लेकर ही युद्ध के लिए यह भूमि चुनी गयी है। संसार में प्रायः तीन बातों को लेकर लड़ाई होती है- भूमि, धन और स्त्री। इन तीनों में भी राजाओं का आपस में लड़ना मुख्यतः जमीन को लेकर होता है। यहाँ ‘कुरुक्षेत्रे’ पद देने का तात्पर्य भी जमीन को लेकर लड़ने में है। कुरुवंश में धृतराष्ट्र और पाण्डु के पुत्र सब एक हो जाते हैं। कुरुवंशी होने से दोनों का कुरुक्षेत्र में अर्थात राजा कुरु की जमीन पर समान हक लगता है। इसलिए दोनों जमीन के लिए लड़ाई करने आए हुए हैं।
यद्यपि अपनी भूमि होने के कारण दोनों के लिए ‘कुरुक्षेत्रे’ पद देना युक्तिसंगत, न्यायसंगत है, तथापि हमारी सनातन वैदिक संस्कृति ऐसी विलक्षण है कि कोई भी कार्य करना होता है, तो वह धर्म को सामने रखकर ही होता है। युद्ध-जैसा कार्य भी धर्मभूमि- तीर्थभूमि में ही करते हैं, जिससे युद्ध में मरने वालों का उद्धार हो जाय, कल्याण हो जाय। अतः यहाँ कुरुक्षेत्र के साथ ‘धर्मक्षेत्रे’ पद आया है। यहाँ आरम्भ में ‘धर्म’ पद से एक और बात भी मालूम होती है। अगर आरम्भ के ‘धर्म’ पद में से ‘धर्’ लिया जाए और अठारहवें अध्याय के अंतिम श्लोक के ‘मम’ पद में से ‘म’ लिया जाए, तो ‘धर्म’ शब्द बन जाता है। अतः सम्पूर्ण गीता धर्म के अंतर्गत है, अर्थात धर्म का पालन करने से गीता के सिद्धांतों का पालन हो जाता है और गीता के सिद्धान्तों के अनुसार कर्तव्य-कर्म करने से धर्म का अनुष्ठान हो जाता है। इन ‘धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे’ पदों से सभी मनुष्यों को यह शिक्षा लेनी चाहिए कि कोई भी काम करना हो तो वह धर्म को सामने रखकर ही करना चाहिए। प्रत्येक कार्य सबके हित की दृष्टि से ही करना चाहिए, केवल अपने सुख-आराम की दृष्टि से नहीं; और कर्तव्य-अकर्तव्य के विषय में शास्त्र को सामने रखना चाहिए। ‘समवेता युयुत्सवः’- राजाओं के द्वारा बार-बार सन्धि का प्रस्ताव रखने पर भी दुर्योधन ने सन्धि करना स्वीकार नहीं किया। इतना ही नहीं, भगवान श्रीकृष्ण के कहने पर भी मेरे पुत्र दुर्योधन ने स्पष्ट कह दिया कि बिना युद्ध के मैं तीखी सूई की नोक-जितनी जमीन भी पांडवों को नहीं दूँगा।
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