गुरुवार, 1 सितंबर 2016

🚩🔱 ❄ «ॐ»«ॐ»«ॐ» ❄ 🔱🚩

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  🌹🌟 राधे नाम संग हरि बोल 🌟🌹
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 🌹🔱🔅श्रीमद्भगवद्गीता🔅🔱🌹

🌹 श्रीमद्भगवद्गीता :
🌹 साधक-संजीवनी :

❄ प्रथम अध्याय :

( गत ब्लाग से आगे )

तस्य संजनयन्हर्षं कुरुवृद्धः पितामहः ।
सिंहनादं विनद्योच्चैः शंखंदध्मौ प्रतापवान् ।। 12 ।।

अर्थ- दुर्योधन के हृदय में हर्ष उत्पन्न करते हुए कुरुवृद्ध प्रभावशाली पितामह भीष्म ने सिंह के समान गरजकर जोर से शंख बजाया।

व्याख्या- ‘तस्य संजनयन् हर्षम्’- यद्यपि दुर्योधन के हृदय में हर्ष होना शंखध्वनि का कार्य है और शंख ध्वनि कारण है, इसलिए यहाँ शंख ध्वनि का वर्णन पहले और हर्ष होने का वर्णन पीछे होने चाहिये अर्थात यहाँ ‘शंख बजाते हुए दुर्योधन को हर्षित किया’- ऐसा कहा जाना चाहिये। परंतु यहाँ ऐसा न कहकर यही कहा है कि ‘दुर्योधन को हर्षित करते हुए भीष्म जी ने शंख बजाया।’ कारण कि ऐसा कहकर संजय यह भाव प्रकट कर रहे हैं कि पितामह भीष्म की संखवादन क्रिया मात्र से दुर्योधन के हृदय में हर्ष उत्पन्न हो ही जाएगा। भीष्म जी के इस प्रभाव को द्योतन करने के लिए ही संजय आगे ‘प्रतापवान्’ विशेषण देते हैं।
कुरुवृद्धः- यद्यपि कुरुवंशियों में आयु की दृष्टि से भीष्म जी से भी अधिक वृद्ध बाह्लीक थे, तथापि कुरुवंशियों में जितने बड़े-बूढ़े थे, उन सब में भीष्म जी धर्म और ईश्वर को विशेषता से जानने वाले थे। अतः ज्ञानवृद्ध होने के कारण संजय भीष्म जी के लिए ‘कुरुवृद्धः’ विशेषण देते हैं। ‘प्रतापवान्’- भीष्मजी के त्याग का बड़ा प्रभाव था। वे कनक-कामिनी के त्यागी थे अर्थात उन्होंने राज्य भी स्वीकार नहीं किया और विवाह भी नहीं किया। भीष्मजी अस्त्र-शस्त्र को चलाने में बड़े निपुण थे और शास्त्र के भी बड़े जानकार थे। उनके इन दोनों गुणों का भी लोगों पर बड़ा प्रभाव था। जब अकेले भीष्म अपने भाई विचित्रवीर्य के लिए काशिराज की कन्याओं को स्वयंवर से हरकर ला रहे थे, तब वहाँ स्वयंवर के लिए इकट्ठे हुए सब क्षत्रिय उन पर टूट पड़े। परंतु अकेले भीष्म जी ने उन सबको हरा दिया। जिनसे भीष्म अस्त्र-शस्त्री की विद्या पढ़े थे, उन पर गुरु परशुराम जी के सामने भी उन्होंने अपनी हार स्वीकार नहीं की। इस प्रकार शास्त्र के विषय में उनका क्षत्रियों पर बड़ा प्रभाव था। जब भीष्म शर-शय्या पर सोये थे, तब भगवान श्रीकृष्ण ने धर्मराज से कहा कि ‘आपको धर्म के विषय में कोई शंका हो तो भीष्म जी से पूछ लें; क्योंकि शास्त्रज्ञान का सूर्य अस्ताचल को जा रहा है अर्थात भीष्म जी इस लोक से जा रहे हैं।’ इस प्रकार शास्त्र के विषय में उनका दूसरों पर बड़ा प्रभाव था।
पितामहः- इस पद का आशय यह मालूम देता है कि दुर्योधन के द्वारा चालाकी से कही गई बातों का द्रोणाचार्य ने कोई उत्तर नहीं दिया। उन्होंने यही समझा कि दुर्योधन चालाकी से मेरे को ठगना चाहता है, इसलिए वे चुप ही रहे। परंतु पितामह होने के नाते भीष्म जी को दुर्योधन की चालाकी में उसका बचपन दीखता है। अतः पितामह भीष्म द्रोणाचार्य समान चुप न रहकर वात्सल्यभाव के कारण दुर्योधन को हर्षित करते हुए शंख बजाते हैं। ‘सिंहनादं विनद्योच्चैः शंख दध्मौ’- जैसे सिंह के गर्जना करने पर हाथी आदि बड़े-बड़े पशु भी भयभीत हो जाते हैं, ऐसे ही गर्जना करने मात्र से सभी भयभीत हो जायँ और दुर्योधन प्रसन्न हो जाए- इसी भाव से भीष्म जी ने सिंह के समान गरजकर जोर से शंख बजाया।

( शेष आगे के ब्लाग में )

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