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🌹🌟 राधे नाम संग हरि बोल 🌟🌹
※❖ॐ∥▩∥श्री∥ஜ ۩۞۩ ஜ∥श्री∥▩∥ॐ❖※
🌹🔱🔅श्रीमद्भगवद्गीता🔅🔱🌹
🌹 श्रीमद्भगवद्गीता :
🌹 साधक-संजीवनी :
🌹 प्रथम अध्याय :
( गत ब्लाग से आगे )
संबंध- पांडव सेना के शंखवादन का कौरव सेना पर क्या असर हुआ- इसको आगे के श्लोक में कहते हैं।
स घोषो धार्तराष्ट्राणां हृदयानि व्यदारयत् ।
नभश्च पृथिवीं चैव तुमुलो व्यनुनायदन् ।। 19 ।।
अर्थ- पांडव सेना के शंखों के उस भयंकर शब्द ने आकाश और पृथ्वी को भी गुँजाते हुए अन्यायपूर्वक राज्य हड़पने वाले दुर्योधन आदि के हृदय विदीर्ण कर दिए।
व्याख्या- ‘स घोषो धार्तराष्ट्राणां.... तुमुलो व्यनुनादयन्’- पांडव-सेना की वह शंख ध्वनि इतनी विशाल, गहरी, ऊँची और भयंकर हुई कि उस से पृथ्वी और आकाश के बीच का भाग गूँज उठा। उस शब्द से अन्यायपूर्वक राज्य को हड़पने वालों के और उनकी सहायता के लिए खड़े हुए राजाओं के हृदय विदीर्ण हो गये। तात्पर्य है कि हृदय को किसी अस्त्र-शस्त्र से विदीर्ण करने से जैसी पीड़ा होती है, वैसी ही पीड़ा उनके हृदय में शंख ध्वनि से हो गयी। उस शंख ध्वनि ने कौरव सेना के हृदय में युद्ध का जो उत्साह था, बल था, उसको कमजोर बना दिया, जिससे उनके हृदय में पांडव-सेना का भय उत्पन्न हो गया। संजय ये बातें धृतराष्ट्र को सुना रहे हैं। धृतराष्ट्र के सामने ही संजय का ‘धृतराष्ट्र के पुत्रों अथवा संबंधियों के हृदय विदीर्ण कर दिये’ ऐसा कहना सभ्यतापूर्ण और युक्तिसंगत नहीं मालूम देता। इसलिए संजय को ‘धार्तराष्ट्राणाम्’ न कहकर ‘तावकीनानाम्’ कहना चाहिए था; क्योंकि ऐसा कहना ही सभ्यता है। इस दृष्टि से यहाँ ‘धार्तराष्ट्राणाम्’ पद का अर्थ ‘जिन्होंने अन्यापूर्वक राज्य को धारण किया’- ऐसा लेना ही युक्तिसंगत तथा सभ्यतापूर्ण मालूम देता है। अन्याय का पक्ष लेने से ही उनके हृदय विदीर्ण हो गए- इन दृष्टि से भी यह अर्थ लेना ही युक्ति संगत मालूम देता है। यहाँ शंका होती है कि कौरवों की ग्यारह अक्षौहिणी सेना के शंख आदि बाजे बजे तो उनके शब्द का पांडव सेना पर कुछ भी असर नहीं हुआ, पर पांडवों की सात अक्षौहिणी सेना के शंख बजे तो उनके शब्द से कौरव सेना के हृदय विदीर्ण क्यों हो गए?
इसका समाधान यह है कि जिनके हृदय में अधर्म, पाप, अन्याय नहीं है अर्थात जो धर्मपूर्वक अपने कर्तव्य का पालन करते हैं, उनका हृदय मजबूत होता है, उनके हृदय में भय नहीं होता। न्याय का पक्ष होने से उनमें उत्साह होता है, शूरवीरता होती है। पांडवों ने वनवास के पहले भी न्याय और धर्मपूर्वक राज्य किया था और वनवास के बाद भी नियम के अनुसार कौरवों से न्यायपूर्वक राज्य मांगा था। अतः उनके हृदय में भय नहीं था, प्रत्युत उत्साह था, शूरवीरता थी। तात्पर्य है कि पांडवों का पक्ष धर्म का था। इस कारण कौरवों की ग्यारह अक्षौहिणी सेना के बाजों के शब्द का पांडव-सेना पर कोई असर नहीं हुआ। परंतु जो अधर्म, पाप, अन्याय आदि करते हैं, उनके हृदय स्वाभाविक ही कमजोर होते हैं. उनके हृदय में निर्भयता, निःशंकता नहीं रहती। उनका खुद का किया पाप, अन्याय ही उनके हृदय को निर्बल बना देता है। अधर्म अधर्मी को खा जाता है। दुर्योधन आदि ने पांडवों को अन्यायपूर्वक मारने का बहुत प्रयास किया था। उन्होंने छल-कपट से अन्यायपूर्वक पांडवों का राज्य छीना था और उनको बहुत कष्ट दिए थे। इस कारण उनके हृदय कमजोर, निर्बल हो चुके थे। तात्पर्य है कि कौरवों का पक्ष अधर्म का था। इसलिए पांडवों की सात अक्षौहिणी सेना की शंख ध्वनि से उनके हृदय विदीर्ण हो गये, उनमें बड़े जोर की पीड़ा हो गयी।
इस प्रसंग से साधक को सावधान हो जाना चाहिये कि उसके द्वारा अपने शरीर, वाणी मन से कभी भी कोई अन्याय और अधर्म का आचरण न हो। अन्याय और अधर्मयुक्त आचरण से मनुष्य का हृदय कमजोर, निर्बल हो जाता है। उसके हृदय में भय पैदा हो जाता है। उदाहरणार्थ, लंकाधिपति रावण से त्रिलोकी डरती थी। वही रावण जब सीता जी का हरण करने जाता है, तब भयभीत होकर इधर-उधर देखता है। इसलिए साधक को चाहिए कि वह अन्याय- अधर्मयुक्त आचरण कभी न करे।
( शेष आगे के ब्लाग में )
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स घोषो धार्तराष्ट्राणां हृदयानि व्यदारयत् ।
नभश्च पृथिवीं चैव तुमुलो व्यनुनायदन् ।। 19 ।।
अर्थ- पांडव सेना के शंखों के उस भयंकर शब्द ने आकाश और पृथ्वी को भी गुँजाते हुए अन्यायपूर्वक राज्य हड़पने वाले दुर्योधन आदि के हृदय विदीर्ण कर दिए।
व्याख्या- ‘स घोषो धार्तराष्ट्राणां.... तुमुलो व्यनुनादयन्’- पांडव-सेना की वह शंख ध्वनि इतनी विशाल, गहरी, ऊँची और भयंकर हुई कि उस से पृथ्वी और आकाश के बीच का भाग गूँज उठा। उस शब्द से अन्यायपूर्वक राज्य को हड़पने वालों के और उनकी सहायता के लिए खड़े हुए राजाओं के हृदय विदीर्ण हो गये। तात्पर्य है कि हृदय को किसी अस्त्र-शस्त्र से विदीर्ण करने से जैसी पीड़ा होती है, वैसी ही पीड़ा उनके हृदय में शंख ध्वनि से हो गयी। उस शंख ध्वनि ने कौरव सेना के हृदय में युद्ध का जो उत्साह था, बल था, उसको कमजोर बना दिया, जिससे उनके हृदय में पांडव-सेना का भय उत्पन्न हो गया। संजय ये बातें धृतराष्ट्र को सुना रहे हैं। धृतराष्ट्र के सामने ही संजय का ‘धृतराष्ट्र के पुत्रों अथवा संबंधियों के हृदय विदीर्ण कर दिये’ ऐसा कहना सभ्यतापूर्ण और युक्तिसंगत नहीं मालूम देता। इसलिए संजय को ‘धार्तराष्ट्राणाम्’ न कहकर ‘तावकीनानाम्’ कहना चाहिए था; क्योंकि ऐसा कहना ही सभ्यता है। इस दृष्टि से यहाँ ‘धार्तराष्ट्राणाम्’ पद का अर्थ ‘जिन्होंने अन्यापूर्वक राज्य को धारण किया’- ऐसा लेना ही युक्तिसंगत तथा सभ्यतापूर्ण मालूम देता है। अन्याय का पक्ष लेने से ही उनके हृदय विदीर्ण हो गए- इन दृष्टि से भी यह अर्थ लेना ही युक्ति संगत मालूम देता है। यहाँ शंका होती है कि कौरवों की ग्यारह अक्षौहिणी सेना के शंख आदि बाजे बजे तो उनके शब्द का पांडव सेना पर कुछ भी असर नहीं हुआ, पर पांडवों की सात अक्षौहिणी सेना के शंख बजे तो उनके शब्द से कौरव सेना के हृदय विदीर्ण क्यों हो गए?
इसका समाधान यह है कि जिनके हृदय में अधर्म, पाप, अन्याय नहीं है अर्थात जो धर्मपूर्वक अपने कर्तव्य का पालन करते हैं, उनका हृदय मजबूत होता है, उनके हृदय में भय नहीं होता। न्याय का पक्ष होने से उनमें उत्साह होता है, शूरवीरता होती है। पांडवों ने वनवास के पहले भी न्याय और धर्मपूर्वक राज्य किया था और वनवास के बाद भी नियम के अनुसार कौरवों से न्यायपूर्वक राज्य मांगा था। अतः उनके हृदय में भय नहीं था, प्रत्युत उत्साह था, शूरवीरता थी। तात्पर्य है कि पांडवों का पक्ष धर्म का था। इस कारण कौरवों की ग्यारह अक्षौहिणी सेना के बाजों के शब्द का पांडव-सेना पर कोई असर नहीं हुआ। परंतु जो अधर्म, पाप, अन्याय आदि करते हैं, उनके हृदय स्वाभाविक ही कमजोर होते हैं. उनके हृदय में निर्भयता, निःशंकता नहीं रहती। उनका खुद का किया पाप, अन्याय ही उनके हृदय को निर्बल बना देता है। अधर्म अधर्मी को खा जाता है। दुर्योधन आदि ने पांडवों को अन्यायपूर्वक मारने का बहुत प्रयास किया था। उन्होंने छल-कपट से अन्यायपूर्वक पांडवों का राज्य छीना था और उनको बहुत कष्ट दिए थे। इस कारण उनके हृदय कमजोर, निर्बल हो चुके थे। तात्पर्य है कि कौरवों का पक्ष अधर्म का था। इसलिए पांडवों की सात अक्षौहिणी सेना की शंख ध्वनि से उनके हृदय विदीर्ण हो गये, उनमें बड़े जोर की पीड़ा हो गयी।
इस प्रसंग से साधक को सावधान हो जाना चाहिये कि उसके द्वारा अपने शरीर, वाणी मन से कभी भी कोई अन्याय और अधर्म का आचरण न हो। अन्याय और अधर्मयुक्त आचरण से मनुष्य का हृदय कमजोर, निर्बल हो जाता है। उसके हृदय में भय पैदा हो जाता है। उदाहरणार्थ, लंकाधिपति रावण से त्रिलोकी डरती थी। वही रावण जब सीता जी का हरण करने जाता है, तब भयभीत होकर इधर-उधर देखता है। इसलिए साधक को चाहिए कि वह अन्याय- अधर्मयुक्त आचरण कभी न करे।
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