रविवार, 7 अगस्त 2016

🚩🔱 ❄ «ॐ»«ॐ»«ॐ» ❄ 🔱🚩

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  🌹🌟 राधे नाम संग हरि बोल 🌟🌹
 ※❖ॐ∥▩∥श्री∥ஜ ۩۞۩ ஜ∥श्री∥▩∥ॐ❖※

 🌹🔱🔅श्रीमद्भगवद्गीता🔅🔱🌹

🌹 श्रीमद्भगवद्गीता :
🌹 साधक-संजीवनी :
🌹 प्रथम अध्याय :

( गत ब्लाग से आगे )

    उसके बाद दुर्योधन ने अपनी सेना के मुख्य-मुख्य योद्धाओं के नाम लेकर उनके रण कौशल आदि की प्रशंसा की। दुर्योधन को प्रसन्न करने के लिए भीष्मजी ने जोर से शंख बजाया। उसको सुनकर कौरव सेना में शंख आदि बाजे बज उठे। फिर चौदहवें श्लोक से उन्नीसवें श्लोक तक ‘पाण्डवाः’ पद का उत्तर देंगे कि रथ में बैठे हुए पाण्डवपक्षीय भगवान श्रीकृष्ण ने शंख बजाया। उसके बाद अर्जुन, भीम, युधिष्ठिर, नकुल, सहदेव आदि ने अपने-अपने शंख बजाये, जिससे दुर्योधन की सेना का हृदय दहल गया। उसके बाद भी संजय पाण्डवों की बात कहते-कहते बीसवें श्लोक से श्रीकृष्ण और अर्जुन के संवाद का प्रसंग आरंभ कर देंगे।]
‘किमकुर्वत’- ‘किम्’ शब्द के तीन अर्थ होते हैं- विकल्प, निन्दा और प्रश्न। युद्ध हुआ कि नहीं? इस तरह का विकल्प तो यहाँ लिया नहीं जा सकता; क्योंकि दस दिन तक युद्ध हो चुका है, और भीष्मजी को रथ से गिरा देने के बाद संजय हस्तिनापुर आकर धृतराष्ट्र को वहाँ की घटना सुना रहे हैं। ‘मेरे और पांडु के पुत्रों ने यह क्या किया, जो कि युद्ध कर बैठे! उनको युद्ध नहीं करना चाहिए था’- ऐसी निन्दा या आक्षेप भी यहां नहीं लिया जा सकता; क्योंकि युद्ध तो चल ही रहा था और धृतराष्ट्र के भीतर भी आक्षेपपूर्वक पूछने का भाव नहीं था।
यहाँ ‘किम्’ शब्द का अर्थ प्रश्न लेना ही ठीक बैठता है। धृतराष्ट्र, संजय से भिन्न-भिन्न प्रकार की छोटी-बड़ी सब घटनाओं को अनुक्रम से विस्तारपूर्वक ठीक-ठीक जानने के लिए ही प्रश्न कर रहे हैं।
सम्बन्ध- धृतराष्ट्र के प्रश्न का उत्तर संजय आगे के श्लोक से देना आरंभ करते हैं।

सञ्जय उवाच
दृष्टवा तु पाण्डवानीकं व्यूढं दुर्योधनस्तदा ।
आचार्यमुपसंगम्य राजा वचनमब्रवीत् ।। 2 ।।

अर्थ- संजय बोले- उस समय वज्रव्यूह- से खड़ी हुई पाण्डव-सेना को देखकर राजा दुर्योधन, द्रोणाचार्य के पास जाकर यह वचन बोला।

व्याख्या- ‘तदा’- जिस समय दोनों सेनाएँ युद्ध के लिए खड़ी हुई थीं, उस समय की बात संजय यहाँ ‘तदा’ पद से कहते हैं। कारण कि धृतराष्ट्र का प्रश्न ‘युद्ध की इच्छा वाले मेरे और पांडु के पुत्रों ने क्या किया’- इस विषय को सुनने के लिए ही है। ‘तु’- धृतराष्ट्र ने अपने और पांडु के पुत्रों के विषय में पूछा है। अतः संजय भी पहले धृतराष्ट्र के पुत्रों की बात बताने के लिए यहाँ ‘तु’ पद का प्रयोग करते हैं। ‘दृष्टवा पाण्डवानीकं व्यूढम्’ – पाण्डवों की वज्रव्यूह से खड़ी सेना को देखने का तात्पर्य है कि पाण्डवों की सेना बड़ी ही सुचारू रूप से और एक ही भाव से खड़ी थी अर्थात उनके सैनिकों में दो भाव नहीं थे, मतभेद नहीं था। उनके पक्ष में धर्म और भगवान श्रीकृष्ण थे। जिसके पक्ष में धर्म और भगवान होते हैं, उसका दूसरों पर बड़ा असर पड़ता है। इसलिए संख्या में कम होने पर भी पाण्डवों की सेना का तेज था और उसका दूसरों पर बड़ा असर पड़ता था। अतः पाण्डव सेना का दुर्योधन पर भी बड़ा असर पड़ा, जिससे वह द्रोणाचार्य के पास जाकर नीतियुक्त गंभीर वचन बोलता है। ‘राजा दुर्योधनः’- दुर्योधन को राजा कहने का तात्पर्य है कि धृतराष्ट्र का सबसे अधिक अपनापन दुर्योधन में ही था। परंपरा की दृष्टि से भी युवराज दुर्योधन ही था। राज्य के सब कार्यों की देखभाल दुर्योधन ही करता था। धृतराष्ट्र तो नाममात्र के राजा थे। युद्ध होने में भी मुख्य हेतु दुर्योधन ही था। इन सभी कारणों से संजय ने दुर्योधन के लिए ‘राजा’ शब्द का प्रयोग किया है। ‘आचार्यमुपसंगम्य’- द्रोणाचार्य के पास जाने में मुख्यतः तीन कारण मालूम देते हैं। -

1 . अपना स्वार्थ सिद्ध करने के लिए अर्थात द्रोणाचार्य के भीतर पाण्डवों के प्रति द्वेष पैदा करके उनको अपने पक्ष में विशेषता से करने के लिए दुर्योधन द्रोणाचार्य के पास गया।

2 . व्यवहार में गुरु के नाते आदर देने के लिए द्रोणाचार्य के पास जाना उचित था।

3 . मुख्य व्यक्ति का सेना में यथा स्थान खड़े रहना बहुत आवश्यक होता है, अन्यथा व्यवस्था बिगड़ जाती है। इसलिए दुर्योधन का द्रोणाचार्य के पास खुद जाना उचित ही था।

( शेष आगे के ब्लाग में )

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 🌹۞☀∥ राधेकृष्ण: शरणम् ∥☀۞🌹
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