🚩🔱 ❄ «ॐ»«ॐ»«ॐ» ❄ 🔱🚩
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🌹🌟 राधे नाम संग हरि बोल 🌟🌹
※❖ॐ∥▩∥श्री∥ஜ ۩۞۩ ஜ∥श्री∥▩∥ॐ❖※
🌹🔱🔅श्रीमद्भगवद्गीता🔅🔱🌹
🌹 श्रीमद्भगवद्गीता :
🌹 साधक-संजीवनी :
🌹 प्रथम अध्याय :
( गत ब्लॉग से आगे )
तब मजबूर होकर पाण्डवों ने भी युद्ध करना स्वीकार किया है। इस प्रकार मेरे पुत्र और पाण्डुपुत्र- दोनों ही सेनाओं के सहित युद्ध की इच्छा से इकट्टे हुए हैं। दोनों सेनाओं में युद्ध की इच्छा रहने पर भी दुर्योधन में युद्ध की इच्छा विशेष रूप से थी। उसका मुख्य उद्देश्य राज्य प्राप्ति का ही था। वह राज्य प्राप्ति धर्म से हो चाहे अधर्म से, न्याय से हो चाहे अन्याय से, विहित रीति से हो चाहे निषिद्ध रीति से, किसी भी तरह से हमें राज्य मिलना चाहिये- ऐसा उसका भाव था। इसलिए विशेषरूप से दुर्योधन का पक्ष ही युयुत्सु अर्थात युद्ध की इच्छा वाला था। पाण्डवों में धर्म की मुख्यता थी। उनका ऐसा भाव था कि हम चाहे जैसा जीवन-निर्वाह कर लेंगे, पर अपने धर्म में बाधा नहीं आने देंगे, धर्म के विरुद्ध नहीं चलेंगे। इस बात को लेकर महाराज युधिष्ठिर युद्ध नहीं करना चाहते थे। परंतु जिस माँ की आज्ञा से युधिष्ठिर ने चारों भाइयों सहित द्रौपदी से विवाह किया था, उस माँ की आज्ञा होने के कारण ही महाराज युधिष्ठिर की युद्ध में प्रवृत्ति हुई थी अर्थात केवल माँ के आज्ञा पालन रूप धर्म से ही युधिष्ठिर युद्ध की इच्छा वाले हुए हैं।
तात्पर्य है कि दुर्योधन आदि तो राज्य को लेकर ही युयुत्सु थे, पर पाण्डव धर्म को लेकर ही युयुत्सु बने थे। ‘मामकाः पाण्डवाश्चैव’- पाण्डव धृतराष्ट्र को पिता के समान समझते थे और उनकी आज्ञा का पालन करते थे। धृतराष्ट्र द्वारा अनुचित आज्ञा देने पर भी पाण्डव उचित-अनुचित का विचार न करके उनकी आज्ञा का पालन करते थे। अतः यहाँ ‘मामकाः’ पद के अंतर्गत कौरव और पाण्डव दोनों आ जाते हैं। फिर भी ‘पाण्डवाः’ पद अलग देने का तात्पर्य है कि धृतराष्ट्र का अपने पुत्रों में तथा पाण्डु पुत्रों में समान भाव नहीं था। उनमें पक्षपात था, अपने पुत्रों के प्रति मोह था। वे दुर्योधन आदि को तो अपना मानते थे, पर पाण्डवों को अपना नहीं मानते थे। इस कारण उन्होंने अपने पुत्रों के लिए ‘मामकाः’ और पाण्डुपुत्रों के लिए ‘पाण्डवाः’ पद का प्रयोग किया है; क्योंकि जो भाव भीतर होते हैं, वे ही प्रायः वाणी से बाहर निकलते हैं। इस द्वैधीभाव के कारण ही धृतराष्ट्र को अपने कुल के संहार का दुःख भोगना पड़ा।
इससे मनुष्य मात्र को यह शिक्षा लेनी चाहिए कि वह अपने घरों में, मुहल्लों में, गाँवों में, प्रांतों में, देशों में, सम्प्रदायों में द्वैधीभाव अर्थात ये अपने हैं, ये दूसरे हैं- ऐसा भाव न रखे। कारण कि द्वैधीभाव से आपस में प्रेम स्नेह नहीं होता प्रत्युत कलह होती है। यहाँ ‘पाण्डवाः’ पद के साथ ‘एव’ पद देने का तात्पर्य है कि पाण्डव तो बड़े धर्मात्मा हैं; अतः उन्हें युद्ध नहीं करना चाहिये था। परंतु वे भी युद्ध के लिए रणभूमि में आ गए तो वहाँ आकर उन्होंने क्या किया?
‘मामकाः’ और ‘पाण्डवाः’ इनमें से पहले ‘मामकाः’ पद का उत्तर संजय आगे के श्लोक से तेरहवें श्लोक तक देंगे कि आपके पुत्र दुर्योधन ने पाण्डवों की सेना को देखकर द्रोणाचार्य के मन में पाण्डवों के प्रति द्वेष पैदा करने के लिए उनके पास जाकर पाण्डवों के मुख्य-मुख्य सेनापतियों के नाम लिये।
( शेष आगे के ब्लाग में )
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🌹۞☀∥ राधेकृष्ण: शरणम् ∥☀۞🌹
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🌹: कृष्णा : श्री राधा प्रेमी : 🌹
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तात्पर्य है कि दुर्योधन आदि तो राज्य को लेकर ही युयुत्सु थे, पर पाण्डव धर्म को लेकर ही युयुत्सु बने थे। ‘मामकाः पाण्डवाश्चैव’- पाण्डव धृतराष्ट्र को पिता के समान समझते थे और उनकी आज्ञा का पालन करते थे। धृतराष्ट्र द्वारा अनुचित आज्ञा देने पर भी पाण्डव उचित-अनुचित का विचार न करके उनकी आज्ञा का पालन करते थे। अतः यहाँ ‘मामकाः’ पद के अंतर्गत कौरव और पाण्डव दोनों आ जाते हैं। फिर भी ‘पाण्डवाः’ पद अलग देने का तात्पर्य है कि धृतराष्ट्र का अपने पुत्रों में तथा पाण्डु पुत्रों में समान भाव नहीं था। उनमें पक्षपात था, अपने पुत्रों के प्रति मोह था। वे दुर्योधन आदि को तो अपना मानते थे, पर पाण्डवों को अपना नहीं मानते थे। इस कारण उन्होंने अपने पुत्रों के लिए ‘मामकाः’ और पाण्डुपुत्रों के लिए ‘पाण्डवाः’ पद का प्रयोग किया है; क्योंकि जो भाव भीतर होते हैं, वे ही प्रायः वाणी से बाहर निकलते हैं। इस द्वैधीभाव के कारण ही धृतराष्ट्र को अपने कुल के संहार का दुःख भोगना पड़ा।
इससे मनुष्य मात्र को यह शिक्षा लेनी चाहिए कि वह अपने घरों में, मुहल्लों में, गाँवों में, प्रांतों में, देशों में, सम्प्रदायों में द्वैधीभाव अर्थात ये अपने हैं, ये दूसरे हैं- ऐसा भाव न रखे। कारण कि द्वैधीभाव से आपस में प्रेम स्नेह नहीं होता प्रत्युत कलह होती है। यहाँ ‘पाण्डवाः’ पद के साथ ‘एव’ पद देने का तात्पर्य है कि पाण्डव तो बड़े धर्मात्मा हैं; अतः उन्हें युद्ध नहीं करना चाहिये था। परंतु वे भी युद्ध के लिए रणभूमि में आ गए तो वहाँ आकर उन्होंने क्या किया?
‘मामकाः’ और ‘पाण्डवाः’ इनमें से पहले ‘मामकाः’ पद का उत्तर संजय आगे के श्लोक से तेरहवें श्लोक तक देंगे कि आपके पुत्र दुर्योधन ने पाण्डवों की सेना को देखकर द्रोणाचार्य के मन में पाण्डवों के प्रति द्वेष पैदा करने के लिए उनके पास जाकर पाण्डवों के मुख्य-मुख्य सेनापतियों के नाम लिये।
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