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🌹🌟 राधे नाम संग हरि बोल 🌟🌹
※❖ॐ∥▩∥श्री∥ஜ ۩۞۩ ஜ∥श्री∥▩∥ॐ❖※
🌹🔱🔅श्रीमद्भगवद्गीता🔅🔱🌹
🌹 श्रीमद्भगवद्गीता :
🌹 साधक-संजीवनी :
🌹 प्रथम अध्याय :
( गत ब्लाग से आगे )
काश्यश्च परमेष्वासः शिखण्डी च महारथः ।
धृष्टद्युम्नो विराटश्च सात्यकिश्चापराजित: ।। 17 ।।
द्रुपदो द्रौपदेयाश्च सर्वशः पृथिवीपते ।
सौभद्रश्च महाबाहुः शंखान्दध्मुः पृथक् पृथक् ।। 18 ।।
अर्थ- हे राजन्! श्रेष्ठ धनुष वाले काशिराज और महारथी शिखंडी तथा धृष्टद्युम्न एवं राजा विराट और अजेय सात्यकि, राजा द्रुपद और द्रौपदी के पाँचों पुत्र तथा लंबी-लंबी भुजाओं वाले सुभद्रा-पुत्र अभिमन्यु- इन सभी ने सब ओर से अलग-अलग शंख बजाए।
व्याख्या- ‘काश्यश्च परमेष्वासः...... शंखान् दध्मुः पृथक्पृथक्’- महारथी शिखंडी बहुत शूरवीर था। यह पहले जन्म में स्त्री था और इस जन्म में भी राजा द्रुपद को पुत्री रूप से प्राप्त हुआ था। आगे चलकर यही शिखंडी स्थूणाकर्ण नामक यक्ष से पुरुषत्व प्राप्त करके पुरुष बना। भीष्म जी इन सब बातों को जानते थे और शिखंडी को स्त्री ही समझते थे। इस कारण वे इस पर बाण नहीं चलाते थे। अर्जुन ने युद्ध के समय इसी को आगे करके भीष्म जी पर बाण चलाये और उनको रथ से नीचे गिरा दिया। अर्जुन का पुत्र अभिमन्यु बहुत शूरवीर था। युद्ध के समय इसने द्रोणनिर्मित चक्रव्यूह में घुसकर अपने पराक्रम से बहुत से वीरों का संहार किया। अंत में कौरव सेना के छः महारथियों ने इसको अन्यायपूर्वक घेरकर इस पर शस्त्र-अस्त्र चलाये। दुःशासन पुत्र के द्वारा सिर पर गदा का प्रहार होने से इसकी मृत्यु हो गयी। संजय ने शंखवादन के वर्णन में कौरव सेना के शूरवीरों में से केवल भीष्म जी का ही नाम लिया और पांडव सेना के शूरवीरों में से भगवान श्रीकृष्ण, अर्जुन, भीम आदि अठारह वीरों के नाम लिये। इससे ऐसा प्रतीत होता है कि संजय के मन में अधर्म के पक्ष का आदर नहीं है। इसलिये वे अधर्म के पक्ष का अधिक वर्णन करना उचित नहीं समझते। परंतु उनके मन में धर्म के पक्ष का आदर होने से और भगवान श्रीकृष्ण तथा पांडवों के प्रति आदरभाव होने से वे उनके पक्ष का ही अधिक वर्णन करना उचित समझते हैं और उनके पक्ष का वर्णन करने में ही उनको आनंद आ रहा है।
( शेष आगे के ब्लाग में )
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🌹۞☀∥ राधेकृष्ण: शरणम् ∥☀۞🌹
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🌹: कृष्णा : श्री राधा प्रेमी : 🌹
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व्याख्या- ‘काश्यश्च परमेष्वासः...... शंखान् दध्मुः पृथक्पृथक्’- महारथी शिखंडी बहुत शूरवीर था। यह पहले जन्म में स्त्री था और इस जन्म में भी राजा द्रुपद को पुत्री रूप से प्राप्त हुआ था। आगे चलकर यही शिखंडी स्थूणाकर्ण नामक यक्ष से पुरुषत्व प्राप्त करके पुरुष बना। भीष्म जी इन सब बातों को जानते थे और शिखंडी को स्त्री ही समझते थे। इस कारण वे इस पर बाण नहीं चलाते थे। अर्जुन ने युद्ध के समय इसी को आगे करके भीष्म जी पर बाण चलाये और उनको रथ से नीचे गिरा दिया। अर्जुन का पुत्र अभिमन्यु बहुत शूरवीर था। युद्ध के समय इसने द्रोणनिर्मित चक्रव्यूह में घुसकर अपने पराक्रम से बहुत से वीरों का संहार किया। अंत में कौरव सेना के छः महारथियों ने इसको अन्यायपूर्वक घेरकर इस पर शस्त्र-अस्त्र चलाये। दुःशासन पुत्र के द्वारा सिर पर गदा का प्रहार होने से इसकी मृत्यु हो गयी। संजय ने शंखवादन के वर्णन में कौरव सेना के शूरवीरों में से केवल भीष्म जी का ही नाम लिया और पांडव सेना के शूरवीरों में से भगवान श्रीकृष्ण, अर्जुन, भीम आदि अठारह वीरों के नाम लिये। इससे ऐसा प्रतीत होता है कि संजय के मन में अधर्म के पक्ष का आदर नहीं है। इसलिये वे अधर्म के पक्ष का अधिक वर्णन करना उचित नहीं समझते। परंतु उनके मन में धर्म के पक्ष का आदर होने से और भगवान श्रीकृष्ण तथा पांडवों के प्रति आदरभाव होने से वे उनके पक्ष का ही अधिक वर्णन करना उचित समझते हैं और उनके पक्ष का वर्णन करने में ही उनको आनंद आ रहा है।
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