रविवार, 21 अगस्त 2016

🚩🔱 ❄ «ॐ»«ॐ»«ॐ» ❄ 🔱🚩

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  🌹🌟 राधे नाम संग हरि बोल 🌟🌹
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 🌹🔱🔅श्रीमद्भगवद्गीता🔅🔱🌹

🌹 श्रीमद्भगवद्गीता :
🌹 साधक-संजीवनी :
🌹 प्रथम अध्याय :

( गत ब्लाग से आगे )

संबंध- दुर्योधन की बातें सुनकर जब द्रोणाचार्य कुछ भी नहीं बोले, तब अपनी चालाकी न चल सकने से दुर्योधन के मन में क्या विचार आता है- इसको संजय आगे के श्लोक में कहते हैं।

अपर्याप्तं तदस्माकं बलं भीष्माभिरक्षितम् ।
पर्याप्तं त्विदमेतेषां बलं भीमाभिरक्षितम् ।। 10 ।।

वह हमारी सेना पांडवों पर विजय करने में अपर्याप्त है, असमर्थ है; क्योंकि उसके संरक्षक भीष्म हैं। परंतु इन पांडवों की सेना हमारे पर विजय करने में पर्याप्त है, समर्थ है; क्योंकि इसके संरक्षक भीमसेन हैं।

व्याख्या- ‘अपर्याप्तं तदस्माकं बलं भीष्माभिरक्षितम्’- अधर्म- अन्याय के कारण दुर्योधन के मन में भय होने से वह अपनी सेना के विषय में सोचता है कि हमारी सेना बड़ी होने पर भी अर्थात पांडवों की अपेक्षा चार अक्षौहिणी अधिक होने पर भी पांडवों पर विजय प्राप्त करने में है तो असमर्थ ही! कारण कि हमारी सेना में मतभेद हैं। उसमें इतनी एकता, निर्भयता, निःसकोचता नहीं है, जितनी की पांडवों की सेना में है। हमारी सेना के मुख्य संरक्षक पितामह भीष्म उभयपक्षपाती हैं अर्थात उनके भीतर कौरव पांडव- दोनों सेनाओं का पक्ष है। वे कृष्ण के बड़े भक्त हैं। उनके हृदय में युधिष्ठिर का बड़ा आदर है। अर्जुन पर भी उनका बड़ा स्नेह है। इसलिए वे हमारे पक्ष में रहते हुए भीतर से पांडवों का भला चाहते हैं। वे ही भीष्म हमारी सेना के मुख्य सेनापति हैं। ऐसी दशा में हमारी सेना पांडवों के मुकाबले में कैसे समर्थ हो सकती है? नहीं हो सकती।
‘पर्याप्तं त्विदमेतेषां बलं भीमाभिरक्षितम्’- परंतु जो पांडवों की सेना है, यह हमारे पर विजय करने में समर्थ है। कारण कि इनकी सेना में मतभेद नहीं है, प्रत्युत सभी एकमत होकर संगठित हैं। इनकी सेना का संरक्षक बलवान भीमसेन है, जो कि बचपन से ही मेरे को हराता आया है। यह अकेला ही मेरे सहित सौ भाइयों को मारने की प्रतिज्ञा कर चुका है अर्थात यह हमारा नाश करने पर तुला हुआ है! इसका शरीर वज्र के समान मजबूत है। इसको मैंने जहर पिलाया था, तो भी यह मरा नहीं। ऐसा यह भीमसेन पांडवों की सेना का संरक्षक है, इसलिए यह सेना वास्तव में समर्थ है, पूर्ण है। यहाँ एक शंका हो सकती है कि दुर्योधन ने अपनी सेना के संरक्षक के लिए भीष्म जी का नाम लिया, जो कि सेनापति के पद पर नियुक्त है। परंतु पांडव सेना के संरक्षक के लिए भीमसेन का नाम लिया, जो कि सेनापति नहीं है। इसका समाधान यह है कि दुर्योधन इस समय सेनापतियों की बात नहीं सोच रहा है; किंतु दोनों सेनाओं की शक्ति के विषय में सोच रहा है कि किस सेना की शक्ति अधिक है? दुर्योधन पर आरंभ से ही भीमसेन की शक्ति का, बलवत्ता का अधिक प्रभाव पड़ा हुआ है। अतः वह पांडव सेना के संरक्षक के लिए भीमसेन का ही नाम लेता है।

( शेष आगे के ब्लाग में )

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