शुक्रवार, 30 सितंबर 2016

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 🌹🔱🔅श्रीमद्भगवद्गीता🔅🔱🌹

🌹श्रीमद्भगवद्गीता :
🌹 साधक-संजीवनी :
🌟 प्रथम अध्याय :

( गत ब्लाग से आगे )

इस कारण अर्जुन में छिपा हुआ कौटुम्बिक ममतायुक्त मोह जाग्रत हो जाए और मोह जाग्रत होने से अर्जुन जिज्ञासु बन जाए, जिससे अर्जुन को निमित्त बनाकर भावी कलियुगी जीवों के कल्याण के लिए गीता का महान उपदेश दिया जा सके- इसी भाव से भगवान ने यहाँ ‘पश्यैतान् समवेतान् कुरून्’ कहा है। नहीं तो भगवान् ‘पश्यैतान् धार्तराष्ट्रान् समानिति’- ऐसा भी कह सकते थे; परंतु ऐसा कहने से अर्जुन के भीतर युद्ध करने का जोश आता; जिससे गीता के प्राकट्य का अवसर ही नहीं आता! और अर्जुन के भीतर का प्रसुप्त कौटुम्बिक मोह भी दूर नहीं होता, जिसको दूर करना भगवान अपनी जिम्मेवारी मानते हैं। जैसे कोई फोड़ा हो जाता है तो वैद्यलोग पहले उसको पकाने की चेष्टा करते हैं और जब वह पक जाता है, तब उसको चीरा देकर साफ कर देते हैं; ऐसे ही भगवान भक्त के भीतर छिपे हुए मोह को पहले जाग्रत करके फिर उसको मिटाते हैं। यहाँ भी भगवान अर्जुन के भीतर छिपे हुए मोह को ‘कुरून् पश्य’ कहकर जाग्रत कर रहे हैं, जिसको आगे उपदेश देकर नष्ट कर देंगे।
अर्जुन कहा था कि ‘इनको मैं देख लूँ’- ‘निरीक्षे’ ‘अवेक्षे’; अतः यहाँ भगवान को ‘पश्य’- ऐसा कहने की जरूरत ही नहीं थी। भगवान को तो केवल रथ खड़ा कर देना चाहिए था। परंतु भगवान ने रथ खड़ा करके अर्जुन के मोह को जाग्रत करने के लिए ही ‘कुरून् पश्य’- ऐसा कहा है।

कौटुम्बिक स्नेह और भगवत्प्रेम- इन दोनों में बहुत अंतर है। कुटुम्ब में ममतायुक्त स्नेह हो जाता है तो कुटुम्ब के अवगुणों की तरफ खयाल जाता ही नहीं; किंतु ‘ये मेरे हैं- ऐसा भाव रहता है। ऐसे ही भगवान का भक्त में विशेष स्नेह हो जाता है तो भक्त के अवगुणों की तरफ भगवान का खयाल जाता ही नहीं; किंतु ‘यह मेरा ही है’- ऐसा ही भाव रहता है। कौटुम्बिक स्नेह में क्रिया तथा पदार्थ की और भगवत्प्रेम में भाव की मुख्यता रहती है। कौटुम्बिक स्नेह में मूढ़ता की और भगवत्प्रेम में आत्मीयता की मुख्यता रहती है। कौटुम्बिक स्नेह में अंधेरा और भगवत्प्रेम में प्रकाश रहता है। कौटुम्बिक स्नेह में मनुष्य कर्तव्यच्युत हो जाता है और भगवत्प्रेम में तल्लीनता के कारण कर्तव्य-पालन में विस्मृति तो हो सकती है, पर भक्त कभी कर्तव्यच्युत नहीं होता। कौटुम्बिक स्नेह में कुटुम्बियों की और भगवत्प्रेम में भगवान की प्रधानता होती है।’

( शेष आगे के ब्लाग में )

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गुरुवार, 22 सितंबर 2016

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🌹 श्रीमद्भगवद्गीता :
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🌹 प्रथम अध्याय :

( गत ब्लाग से आगे )

संबंध- अर्जुन के ऐसा कहने पर भगवान ने क्या किया- इसको संजय आगे के दो श्लोक में कहते हैं।

एवमुक्तो हृषीकेशो गुडाकेशेन भारत ।
सेनयोरुभयोर्मध्ये स्थापयित्वा रतोत्तमम् ।। 24 ।।
भीष्मद्रोणप्रमुखतः सर्वेषां च महीक्षिताम् ।
उवाच पार्थ पश्यैतान्समवेतान्कुरूनिति ।। 25 ।।
अर्थ- संजय बोले- हे भरtवंशी राजन् ! निद्राविजयी अर्जुन के द्वारा इस तरह कहने पर अंतर्यामी भगवान श्रीकृष्ण ने दोनों सेनाओं के मध्य भाग में पितामह भीष्म और आचार्य द्रोण के सामने तथा संपूर्ण राजाओं के सामने श्रेष्ठ रथ को खड़ा करके इस तरह कहा कि ‘हे पार्थ! इन इकट्ठे हुए कुरुवंशियों को देख।’

व्याख्या- ‘गुडाकेशेन’- ‘गुडाकेश’ शब्द के दो अर्थ होते हैं-

‘गुडा’ नाम मुड़े हुए का है और ‘केश’ नाम बालों का है। जिसके सिर के बाल मुड़े हुए अर्थात घुँघराले हैं, उसका नाम ‘गुडाकेश’ है।

‘गुडाका’ नाम निद्रा का है और ‘ईश’ नाम स्वामी का है। जो निद्रा का स्वामी है अर्थात निद्रा ले चाहे न ले- ऐसा जिसका निद्रा पर अधिकार है, उसका नाम ‘गुडाकेश’ है। अर्जुन के केश घुँघराले थे और उनका निद्रा पर आधिपत्य था; अतः उनको ‘गुडाकेश’ कहा गया है।

‘एवमुक्तः’- जो निद्रा- आलस्य के सुख का गुलाम नहीं होता और जो विषय- भोगों का दास नहीं होता, केवल भगवान का ही दास होता है, उस भक्त की बात भगवान सुनते हैं; केवल सुनते ही नहीं, उसकी आज्ञा का पालन भी करते हैं। इसलिए अपने सखा भक्त अर्जुन के द्वारा आज्ञा देने पर अंतर्यामी भगवान श्रीकृष्ण ने दोनों सेनाओं के बीच में अर्जुन का रथ खड़ा कर दिया।

‘हृषीकेशः’- इंद्रियों का नाम ‘हृषीक’ है। जो इंद्रियों के ईश अर्थात स्वामी हैं, उनको हृषीकेश कहते हैं। पहले इक्कीसवें श्लोक में और यहाँ ‘हृषीकेश’ कहने का तात्पर्य है कि जो मन, बुद्धि, इंद्रियाँ आदि सब के प्रेरक हैं, सबको आज्ञा देने वाले हैं, वे ही अंतर्यामी भगवान यहाँ अर्जुन की आज्ञा का पालन करने वाले बन गये हैं! यह उनकी अर्जुन पर कितनी अधिक कृपा है!
‘सेनयोरुभयोर्मध्ये स्थापयित्वा रथोत्तमम्’- दोनों सेनाओं के बीच में जहाँ खाली जगह थी, वहाँ भगवान ने अर्जुन के श्रेष्ठ रथ को खड़ा कर दिया।

‘भीष्मद्रोणमुखतः सर्वेषां च महीक्षिताम्’- उस रथ को भी भगवान ने विलक्षण चतुराई से ऐसी जगह खड़ा किया, जहाँ से अर्जुन को कौटुम्बिक संबंध वाले पितामह भीष्म, विद्या के संबंध वाले आचार्य द्रोण एवं कौरव सेना के मुख्य-मुख्य राजा लोग सामने दिखायी दे सकें।

‘उवाच पार्थ पश्यैतान्समवेतान्कुरुनिति’- ‘कुरु’ पद में धृतराष्ट्र के पुत्र और पांडु के पुत्र- ये दोनों आ जाते हैं; क्योंकि ये दोनों ही कुरुवंशी हैं। युद्ध के लिए एकत्र हुए इन कुरुवंशियों को देख- ऐसा कहने का तात्पर्य है कि इन कुरुवंशियों को देखकर अर्जुन के भीतर यह बाव पैदा हो जाए कि हम सब एक ही तो हैं! इस पक्ष के हों, चाहे उस पक्ष के हों; भले हों, चाहे बुरे हों; सदाचारी हों, चाहे दुराचारी हों; पर हैं सब अपने ही कुटुम्बी।

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मंगलवार, 20 सितंबर 2016

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🌹 श्रीमद्भगवद्गीता :
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🌟 प्रथम अध्याय :

( गत ब्लाग से आगे )

योत्स्यमानानवेक्षेऽहं य एतेऽत्र समागताः ।
धार्तराष्ट्रस्य दुर्बुद्धेर्युद्धे प्रियचिकीर्षवः ।। 23 ।।

अर्थ- दुष्टबुद्धि दुर्योधन का युद्ध में प्रिय करने की इच्छा वाले जो ये राजा लोग इस सेना में आये हुए हैं, युद्ध करने को उतावले हुए इन सबको मैं देख लूँ।

'व्याख्या'- ‘धार्तराष्ट्रस्य दुर्बुद्धेर्युद्धे प्रियचिकीर्षवः’- यहाँ दुर्योधन को दुष्ट बुद्धि कहकर अर्जुन यह बताना चाहते हैं कि इस दुर्योधन ने हमारा नाश करने के लिए आज तक कई तरह के षड्यंत्र रचे हैं। हमें अपमानित करने के ले कई तरह के उद्योग किए हैं। नियम के अनुसार और न्यायपूर्वक हम आधे राज्य के अधिकारी हैं, पर उसको भी यह हड़पना चाहता है, देना नहीं चाहता। ऐसी तो इसकी दुष्टबुद्धि है; और यहाँ आये हुए राजा लोग युद्ध में इसका प्रिय करना चाहते हैं ! वास्तव में तो मित्रों का यह कर्तव्य होता है कि वे ऐसा काम करें, ऐसी बात बताएं, जिससे अपने मित्र का लोक-परलोक में हित हो। परंतु ये राजा लोग दुर्योधन की दुष्टबुद्धि को शुद्ध न करके उलटे उसको बढ़ाना चाहते है और दुर्योधन से युद्ध कराकर, युद्ध में उसकी सहायता करके उसका पतन ही करना चाहते हैं। तात्पर्य है कि दुर्योधन का हित किस बात में है; उसको राज्य भी किस बात से मिलेगा और उसका परलोक भी किस बात से सुधरेगा- इन बातों का वे विचार ही नहीं कर रहे हैं। अगर ये राजा लोग उसको यह सलाह देते कि भाई, कम से कम आधा राज्य तुम रखो और पांडवों का आधा राज्य पांडवों को दे दो तो इससे दुर्योधन का आधा राज्य भी रहता और उसका परलोक भी सुधरता।

‘योत्स्यमानानवेक्षऽहं य एतेऽत्र समागताः’- इन युद्ध के लिए उतावले होने वालों को जरा देख तो लूँ! इन्होंने अधर्म का, अन्याय का पक्ष लिया है, इसलिए ये हमारे सामने टिक नहीं सकेंगे, नष्ट हो जाएंगे।
‘योत्स्यमानान्’ कहने का तात्पर्य है कि इनके मन में युद्ध की ज्यादा आ रही है; अतः देखूँ तो सही कि ये हैं कौन?

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रविवार, 18 सितंबर 2016

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🌹 श्रीमद्भगवद्गीता :
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🌹 प्रथम अध्याय :

( गत ब्लाग से आगे )

हृषीकेशं तदा वाक्यमिदमाह महीपते ।
सेनयोरुभोर्मध्ये रथं स्थापय मेऽच्युत ।। 21 ।।
यावदेतान्निरीक्षऽहं योद्धुकामानवस्थितान् ।
कैर्मया सह योद्धव्यमस्मिन्रणसमुद्यमे ।। 22 ।।

अर्थ- अर्जुन बोले- हे अच्युत ! दोनों सेनाओं के मध्य में मेरे रथ को आप तब तक खड़ा कीजिये, जब तक मैं युद्धक्षेत्र में खड़े हुये इन युद्ध की इच्छा वालों को देख न लूँ कि इस युद्धरूप उद्योग में मुझे किन-किन के साथ युद्ध करना योग्य है।

व्याख्या- ‘अच्युत सेनायोरुभयोर्मध्ये रथं स्थापय’- दोनों सेनाएँ जहाँ युद्ध करने के लिये एक-दूसरे के सामने खड़ी थी, वहाँ उन दोनों सेनाओं में इतनी दूरी थी कि येक सेना दूसरी सेना पर बाण आदि मार सके। उन दोनों सेनाओं का मध्यभाग दो तरफ से मध्य था-
1. सेनाएँ जितनी चौड़ी खड़ी थीं, उस चौड़ाई का मध्यभाग और
2. दोनों सेनाओं का मध्यभाग, जहाँ से कौरव सेना जितनी दूरी पर खड़ी थी, उतनी ही दूरी पर पांडव सेना खड़ी थी। ऐसे मध्य भाग में खड़ा करने के लिये अर्जुन भगवान से कहते हैं, जिससे दोनों सेनाओं को आसानी से देखा जा सके।

‘सेनयोरुभयोर्मध्ये’ पद गीता में तीन बार आया है- यहाँ, इसी अध्याय के चौबीसवें श्लोक में और दूसरे अध्याय में दसवें श्लोक में। तीन बार आने का तात्पर्य है कि पहले अर्जुन शूरवीरता के साथ अपने रथ को दोनों सेनाओं के बीच में खड़ा करने की आज्ञा देते हैं, फिर भगवान दोनों सेनाओं के बीच में रथ को खड़ा करके कुरुवशियों को देखने के लिये कहते हैं। और अंत में दोनों सेनाओं के बीच में ही विषादमग्र अर्जुन को गीता का उपदेश देते हैं। इस प्रकार पहले अर्जुन में शूरवीरता थी, बीच में कुटुम्बियों को देखने से मोह के कारण उनकी युद्ध से उपरति हो गयी और अंत में उनको भगवान द्वारा गीता का महान उपदेश प्राप्त हुआ, जिससे उनका मोह दूर हो गया। इससे यह भाव निकलता है कि मनुष्य जहाँ-कहीं और जिस-किसी परिस्थिति में स्थित है, वहीं रहकर वह प्राप्त परिस्थिति का सदुपयोग करके निष्काम हो सकता है और वहीं उसको परमात्मा की प्राप्ति हो सकती है। कारण कि परमात्मा संपूर्ण परिस्थितियों में सदा येक रूप से रहते हैं।

‘यावदेतान्निरीक्षेऽहं.......रणसमुद्यमे’- दोनों सेनाओं के बीच में रथ कब तक खड़ा करें? इस पर अर्जुन कहते हैं कि युद्ध की इच्छा को लेकर कौरव-सेना में आये हुये सेना सहित जितने भी राजालोग खड़े हैं, उन सबको जब तक मैं देख न लूँ, तब तक आप रथ को वहीं खड़ा रखिये। इस युद्ध के उद्योग में मुझे किन-किन के साथ युद्ध करना है? उनमें कौन मेरे समान बलवाले हैं? कौन मेरे से कम बलवाले हैं? और कौन मेरे से अधिक बलवाले हैं? उन सबको मैं जरा देख लूँ।

यहाँ ‘योद्धुकामान्’ पद से अर्जुन कह रहे हैं कि हमने तो संधि की बात ही सोची थी, पर उन्होंने संधि की बात स्वीकार नहीं की; क्योंकि उनके मन में युद्ध करने की ज्यादा इच्छा है। अतः उनको मैं देखूँ कि कितने बल को लेकर वे युद्ध करने की इच्छा रखते हैं।

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बुधवार, 14 सितंबर 2016

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( गत ब्लाग से आगे )

कविध्वजः- अर्जुन के लिये ‘कपिध्वज’ विशेषण देकर संजय धृतराष्ट्र को अर्जुन के रथ की ध्वजा पर विराजमान हनुमान जी का स्मरण कराते हैं। जब पांडव वन में रहते थे, तब एक दिन अकस्मात वायु ने एक दिव्य सहस्र दल कमल लाकर द्रौपदी के सामने डाल दिया। उसे देखकर द्रौपदी बहुत प्रसन्न हो गयी और उससे भीमसेन से कहा कि ‘वीरवर!’ आप ऐसे बहुत से कमल ला दीजिये। द्रौपदी की इच्छा पूर्ण करने के लिये भीमसेन वहाँ से चल पड़े। जब वे कदलीवन में पहुँचे, तब वहाँ उनकी हनुमान जी से भेंट हो गयी। उन दोनों की आपस में कई बातें हुईं। अंत में हनुमान जी ने भीमसेन से वरदान मांगने के लिए आग्रह किया तो भीमसेन ने कहा कि ‘मेरे पर आपकी कृपा बनी रहे’। इस पर हनुमान जी ने कहा कि ‘हे वायु पुत्र! जिस समय तुम बाण और शक्ति के आघात से व्याकुल शत्रुओं की सेना में घुसकर सिंहनाद करोगे, उस समय मैं अपनी गर्जना से उस सिंहनाद और बढ़ा दूँगा। इसके सिवाय अर्जुन के रथ की ध्वजा पर बैठकर मैं ऐसी भयंकर गर्जना किया करूँगा, जो शत्रुओं को सुगमता से मार सकोगे।’ इस प्रकार जिनके रथ की ध्वजा पर हनुमान जी विराजमान हैं, विजय निश्चित है।
पांडवः- धृतराष्ट्र ने अपने प्रश्न में ‘पांडवाः’ पद का प्रयोग किया था। अतः धृतराष्ट्र को बार-बार पांडवों की याद दिलाने के लिये संजय ‘पांडवः’ शब्द का प्रयोग करते हैं।
हृषीकेशं तदा वाक्यमिदमाह महीपते- पांडव सेना को देखकर दुर्योधन तो गुरु द्रोणाचार्य के पास जाकर चालाकी से भरे हुए वचन बोलता है; परन्तु अर्जुन कौरव सेना को देखकर जो जगद्गुरु अंतर्यामी हैं, मन-बुद्धि आदि के प्रेरक हैं- ऐसे भगवान श्रीकृष्ण से शूरवीरता, उत्साह और अपने कर्तव्य से भरे हुए वचन बोलते हैं।

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सोमवार, 12 सितंबर 2016

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संबंध- धृतराष्ट्र ने पहले श्लोक में अपने और पांडु के पुत्रों के विषय में प्रश्न किया था। उसका उत्तर संजय ने दूसरे श्लोक से उन्नीसवें श्लोक तक दे दिया। अब संजय भगवद्गीता के प्राकट्य का प्रसंग आगे के श्लोक से आरंभ करते हैं।

अथ व्यवस्थितान्दृष्टवा धार्तराष्ट्रान् कपिध्वजः ।
प्रवृत्ते शस्त्रसंपाते धनुरुद्यम्य पांडवः ।। 20 ।।

अर्थ- हे महीपते धृतराष्ट्र! अब शस्त्रों के चलने की तैयारी हो रही थी कि उस समय अन्यायपूर्वक राज्य को धारण करने वाले राजाओं और उनके साथियों को व्यवस्थित रूप से सामने खड़े हुए देखकर कपिध्वज पांडु पुत्र अर्जुन ने अपना गांडीव धनुष उठा लिया और अंतर्यामी भगवान श्रीकृष्ण से ये वचन बोले।

व्याख्या- ‘अथ’- इस पद का तात्पर्य है कि अब संजय भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन के संवादरूप ‘भगवद्गीता’ का आरंभ करते हैं। अठारहवें अध्याय के चौहत्तरवें श्लोक में आए ‘इति’ पद से यह संवाद समाप्त होता है। ऐसे ही भगवद्गीता के उपदेश का आरंभ उसके दूसरे अध्याय के ग्यारहवें श्लोक से होता है और अठारहवें अध्याय के छाछठवें श्लोक में यह उपदेश समाप्त होता है।

प्रवृत्ते शस्त्रसंपाते- यद्यपि पितामह भीष्म ने युद्धारंभ की घोषणा के लिए शंख नहीं बजाया था, प्रत्युत केवल दुर्योधन को प्रसन्न करने के लिए ही शंख बजाया था, तथापि कौरव और पांडवसेना ने उसको युद्धारंभ की घोषणा ही मान लिया और अपने-अपने अस्त्र-शस्त्र हाथ में उठाकर तैयार हो गये। इस तरह सेना को शस्त्र उठाये देखकर वीरता में भरकर अर्जुन ने भी अपना गांडीव धनुष हाथ में उठा लिया।

व्यवस्थितान् धार्तराष्ट्रान् दृष्टा- इन पदों से संजय का तात्पर्य है कि जब आपके पुत्र दुर्योधन ने पांडवों की सेना को देखा, तब वह भागा-भागा द्रोणाचार्य के पास गया। परंतु जब अर्जुन ने कौरवों की सेना को देखा, तब उनका हाथ सीधे गांडीव धनुष पर ही गया- ‘धनुरुद्यम्य’। इससे मालूम होता है कि दुर्योधन के भीतर भय है कि और अर्जुन के भीतर निर्भयता है, उत्साह है, वीरता है।

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शनिवार, 10 सितंबर 2016

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संबंध- पांडव सेना के शंखवादन का कौरव सेना पर क्या असर हुआ- इसको आगे के श्लोक में कहते हैं।

स घोषो धार्तराष्ट्राणां हृदयानि व्यदारयत् ।
नभश्च पृथिवीं चैव तुमुलो व्यनुनायदन् ।। 19 ।।

अर्थ- पांडव सेना के शंखों के उस भयंकर शब्द ने आकाश और पृथ्वी को भी गुँजाते हुए अन्यायपूर्वक राज्य हड़पने वाले दुर्योधन आदि के हृदय विदीर्ण कर दिए।

व्याख्या- ‘स घोषो धार्तराष्ट्राणां.... तुमुलो व्यनुनादयन्’- पांडव-सेना की वह शंख ध्वनि इतनी विशाल, गहरी, ऊँची और भयंकर हुई कि उस से पृथ्वी और आकाश के बीच का भाग गूँज उठा। उस शब्द से अन्यायपूर्वक राज्य को हड़पने वालों के और उनकी सहायता के लिए खड़े हुए राजाओं के हृदय विदीर्ण हो गये। तात्पर्य है कि हृदय को किसी अस्त्र-शस्त्र से विदीर्ण करने से जैसी पीड़ा होती है, वैसी ही पीड़ा उनके हृदय में शंख ध्वनि से हो गयी। उस शंख ध्वनि ने कौरव सेना के हृदय में युद्ध का जो उत्साह था, बल था, उसको कमजोर बना दिया, जिससे उनके हृदय में पांडव-सेना का भय उत्पन्न हो गया। संजय ये बातें धृतराष्ट्र को सुना रहे हैं। धृतराष्ट्र के सामने ही संजय का ‘धृतराष्ट्र के पुत्रों अथवा संबंधियों के हृदय विदीर्ण कर दिये’ ऐसा कहना सभ्यतापूर्ण और युक्तिसंगत नहीं मालूम देता। इसलिए संजय को ‘धार्तराष्ट्राणाम्’ न कहकर ‘तावकीनानाम्’ कहना चाहिए था; क्योंकि ऐसा कहना ही सभ्यता है। इस दृष्टि से यहाँ ‘धार्तराष्ट्राणाम्’ पद का अर्थ ‘जिन्होंने अन्यापूर्वक राज्य को धारण किया’- ऐसा लेना ही युक्तिसंगत तथा सभ्यतापूर्ण मालूम देता है। अन्याय का पक्ष लेने से ही उनके हृदय विदीर्ण हो गए- इन दृष्टि से भी यह अर्थ लेना ही युक्ति संगत मालूम देता है। यहाँ शंका होती है कि कौरवों की ग्यारह अक्षौहिणी सेना के शंख आदि बाजे बजे तो उनके शब्द का पांडव सेना पर कुछ भी असर नहीं हुआ, पर पांडवों की सात अक्षौहिणी सेना के शंख बजे तो उनके शब्द से कौरव सेना के हृदय विदीर्ण क्यों हो गए?
इसका समाधान यह है कि जिनके हृदय में अधर्म, पाप, अन्याय नहीं है अर्थात जो धर्मपूर्वक अपने कर्तव्य का पालन करते हैं, उनका हृदय मजबूत होता है, उनके हृदय में भय नहीं होता। न्याय का पक्ष होने से उनमें उत्साह होता है, शूरवीरता होती है। पांडवों ने वनवास के पहले भी न्याय और धर्मपूर्वक राज्य किया था और वनवास के बाद भी नियम के अनुसार कौरवों से न्यायपूर्वक राज्य मांगा था। अतः उनके हृदय में भय नहीं था, प्रत्युत उत्साह था, शूरवीरता थी। तात्पर्य है कि पांडवों का पक्ष धर्म का था। इस कारण कौरवों की ग्यारह अक्षौहिणी सेना के बाजों के शब्द का पांडव-सेना पर कोई असर नहीं हुआ। परंतु जो अधर्म, पाप, अन्याय आदि करते हैं, उनके हृदय स्वाभाविक ही कमजोर होते हैं. उनके हृदय में निर्भयता, निःशंकता नहीं रहती। उनका खुद का किया पाप, अन्याय ही उनके हृदय को निर्बल बना देता है। अधर्म अधर्मी को खा जाता है। दुर्योधन आदि ने पांडवों को अन्यायपूर्वक मारने का बहुत प्रयास किया था। उन्होंने छल-कपट से अन्यायपूर्वक पांडवों का राज्य छीना था और उनको बहुत कष्ट दिए थे। इस कारण उनके हृदय कमजोर, निर्बल हो चुके थे। तात्पर्य है कि कौरवों का पक्ष अधर्म का था। इसलिए पांडवों की सात अक्षौहिणी सेना की शंख ध्वनि से उनके हृदय विदीर्ण हो गये, उनमें बड़े जोर की पीड़ा हो गयी।

इस प्रसंग से साधक को सावधान हो जाना चाहिये कि उसके द्वारा अपने शरीर, वाणी मन से कभी भी कोई अन्याय और अधर्म का आचरण न हो। अन्याय और अधर्मयुक्त आचरण से मनुष्य का हृदय कमजोर, निर्बल हो जाता है। उसके हृदय में भय पैदा हो जाता है। उदाहरणार्थ, लंकाधिपति रावण से त्रिलोकी डरती थी। वही रावण जब सीता जी का हरण करने जाता है, तब भयभीत होकर इधर-उधर देखता है। इसलिए साधक को चाहिए कि वह अन्याय- अधर्मयुक्त आचरण कभी न करे।

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गुरुवार, 8 सितंबर 2016

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काश्यश्च परमेष्वासः शिखण्डी च महारथः ।
धृष्टद्युम्नो विराटश्च सात्यकिश्चापराजित: ।। 17 ।।
द्रुपदो द्रौपदेयाश्च सर्वशः पृथिवीपते ।
सौभद्रश्च महाबाहुः शंखान्दध्मुः पृथक् पृथक् ।। 18 ।।

अर्थ- हे राजन्! श्रेष्ठ धनुष वाले काशिराज और महारथी शिखंडी तथा धृष्टद्युम्न एवं राजा विराट और अजेय सात्यकि, राजा द्रुपद और द्रौपदी के पाँचों पुत्र तथा लंबी-लंबी भुजाओं वाले सुभद्रा-पुत्र अभिमन्यु- इन सभी ने सब ओर से अलग-अलग शंख बजाए।

व्याख्या- ‘काश्यश्च परमेष्वासः...... शंखान् दध्मुः पृथक्पृथक्’- महारथी शिखंडी बहुत शूरवीर था। यह पहले जन्म में स्त्री था और इस जन्म में भी राजा द्रुपद को पुत्री रूप से प्राप्त हुआ था। आगे चलकर यही शिखंडी स्थूणाकर्ण नामक यक्ष से पुरुषत्व प्राप्त करके पुरुष बना। भीष्म जी इन सब बातों को जानते थे और शिखंडी को स्त्री ही समझते थे। इस कारण वे इस पर बाण नहीं चलाते थे। अर्जुन ने युद्ध के समय इसी को आगे करके भीष्म जी पर बाण चलाये और उनको रथ से नीचे गिरा दिया। अर्जुन का पुत्र अभिमन्यु बहुत शूरवीर था। युद्ध के समय इसने द्रोणनिर्मित चक्रव्यूह में घुसकर अपने पराक्रम से बहुत से वीरों का संहार किया। अंत में कौरव सेना के छः महारथियों ने इसको अन्यायपूर्वक घेरकर इस पर शस्त्र-अस्त्र चलाये। दुःशासन पुत्र के द्वारा सिर पर गदा का प्रहार होने से इसकी मृत्यु हो गयी। संजय ने शंखवादन के वर्णन में कौरव सेना के शूरवीरों में से केवल भीष्म जी का ही नाम लिया और पांडव सेना के शूरवीरों में से भगवान श्रीकृष्ण, अर्जुन, भीम आदि अठारह वीरों के नाम लिये। इससे ऐसा प्रतीत होता है कि संजय के मन में अधर्म के पक्ष का आदर नहीं है। इसलिये वे अधर्म के पक्ष का अधिक वर्णन करना उचित नहीं समझते। परंतु उनके मन में धर्म के पक्ष का आदर होने से और भगवान श्रीकृष्ण तथा पांडवों के प्रति आदरभाव होने से वे उनके पक्ष का ही अधिक वर्णन करना उचित समझते हैं और उनके पक्ष का वर्णन करने में ही उनको आनंद आ रहा है।

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बुधवार, 7 सितंबर 2016

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संबंध- अब संजय आगे के चार श्लोकों में पूर्व श्लोक का खुलासा करते हुए दूसरों के शंखवादन का वर्णन करते हैं।

पाञ्चजन्यं हृषीकेशो देवदत्तं धनञ्जयः।
पौंड्र दध्मौ महाशंख भीमकर्मा वृकोदरः।। 15 ।।

अर्थ- अंतर्यामी भगवान श्रीकृष्ण ने पाञ्चजन्य नामक तथा धनञ्जय अर्जुन ने देवदत्त नामक शंख बजाया; और भयानक कर्म करने वाले वृकोदर भीम ने पौंड्र नामक महाशंख बजाया।

व्याख्या- ‘पाञ्यजन्यं हृषीकेशः’- सबके अन्तर्यामी अर्थात सबके भीतर की बात जाने वाले साक्षात भगवान श्रीकृष्ण ने पाण्डवों के पक्ष में खड़े होकर ‘पाञ्चजन्य’ नामक शंख बजाया। भगवान पंचजन नामक शंख रुपधारी दैत्य को मारकर उसको शंखरुप से ग्रहण किया था, इसलिए इस शंख का नाम ‘पाञ्चजन्य’ हो गया।

देवदत्तं धनञ्जयः- राजसूय यज्ञ के समय अर्जुन ने बहुत से राजाओं को जीतकर बहुत धन इकट्ठा किया था। इस करण अर्जुन का नाम ‘धनञ्जय’ पड़ गया। निवातकवचादि दैत्यों के साथ युद्ध करते समय इंद्र ने अर्जुन को ‘देवदत्त’ नामक शंख दिया था। इस शंख की ध्वनि बड़े जोर से होती थी, जिससे शत्रुओं की सेना घबरा जाती थी। इस शंख को अर्जुन ने बजाया। ‘पौंड्र दध्मौ महाशंख भीमकर्ता वृकोदरः’- हिडिम्बासुर, बकासुर, जटासुर आदि असुरों तथा कीचक, जरासन्ध आदि बलवान वीरों को मारने के कारण भीमसेन का नाम ‘भीमकर्मा’ पड़ गया। उनके पेट में जठराग्नि के सिवाय ‘वृक’ नाम की एक विशेष अग्नि थी, जिससे बहुत अधिक भोजन पचता था। इस कारण उनका नाम ‘वृकोदर’ पड़ गया। ऐसे भीमकर्मा वृकोदर भीमसेन ने बहुत बड़े आकार वाला ‘पौंड्र’ नामक शंख बजाया।

 अनन्तविजयं राजा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः।
नकुलः सहदेवश्च सुघोषमणिपुष्पकौ।। 16 ।।

अर्थ- कुंती पुत्र राजा युधिष्ठिर ने अनन्तविजय नामक शंख बजाया तथा नकुल और सहदेव ने सुघोष और मणिपुष्पक नामक शंख बजाये।

व्याख्या- ‘अनन्तविजयं राजा....... सुघोषमणि पुष्पकौ’- अर्जुन, भीम और युधिष्ठिर- ये तीनों कुंती के पुत्र हैं तथा नकुल और सहदेव- ये दोनों माद्री के पुत्र हैं, यह विभाग दिखाने के लिए ही यहाँ युधिष्ठिर के लिए ‘कुंतीपुत्र’ विशेषण दिया गया है। युधिष्ठिर को राजा कहने का तात्पर्य है कि युधिष्ठिर जी वनवास के पहले अपने आधे राज्य के राजा थे, और नियम के अनुसार बारह वर्ष वनवास और एक वर्ष अज्ञातवास के बाद वे राजा होने चाहिए थे। ‘राजा’ विशेषण देकर संजय यह भी संकेत करना चाहते हैं कि आगे चलकर धर्मराज युद्धिष्ठिर ही संपूर्ण पृथ्वीमंडल के राजा होंगे।

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दिव्यौ शंखौ प्रद्ध्मतुः- भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन के हाथों में जो शंख थे, वे तेजोमय और अलौकिक थे। उन शंखों को उन्होंने बड़े जोर से बजाया।
यहाँ शंका हो सकती है कि कौरव पक्ष में मुख्य सेनापति पितामह भीष्म हैं, इसलिए उनका सबसे पहले शंख बजाना ठीक ही है; परंतु पांडव सेना में मुख्य सेनापति धृष्टद्युम्न के रहते हुए ही सारथि बने हुए भगवान श्रीकृष्ण ने सबसे पहले शंख क्यों बजाया? इसका समाधान है कि भगवान सारथि बने चाहें महारथी बनें, उनकी मुख्यता कभी मिट ही नहीं सकती। वे जिस किसी भी पद पर रहें, सदा सबसे बड़े ही बने रहते हैं। कारण कि वे अच्युत हैं, कभी च्युत होते ही नहीं। पांडव सेना में भगवान श्रीकृष्ण ही मुख्य थे और वे ही सबका संचालन करते थे। जब वे बाल्यावस्था में थे, उस समय भी नंद, उपनंद आदि उनकी बात मानते थे। तभी तो उन्होंने बालक श्रीकृष्ण के कहने से परंपरा से चली आयी इंद्र- पूजा को छोड़कर गोवर्धन की पूजा करनी शुरू कर दी। तात्पर्य है कि भगवान जिस किसी अवस्था में, जिस किसी स्थान पर और जहाँ कहीं भी रहते हैं, वहाँ वे मुख्य ही रहते हैं। इसीलिये भगवान ने पांडव सेना में सबसे पहले शंख बजाया। जो स्वयं छोटा होता है, वही ऊँचे स्थान पर नियुक्त होने से बड़ा माना जाता है। अतः जो ऊँचे स्थान के कारण अपने को बड़ा मानता है, वह स्वयं वास्तव में छोटा ही होता है। परंतु जो स्वयं बड़ा होता है, वह जहाँ भी रहता है, उसके कारण वह स्थान भी बड़ा माना जाता है। जैसे भगवान यहाँ सारथि बने हैं, तो उनके कारण वह सारथि का स्थान भी ऊँचा हो गया।

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रविवार, 4 सितंबर 2016

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संबंध- इस अध्याय के आरंभ में धृतराष्ट्र ने संजय से पूछा था कि युद्ध क्षेत्र में मेरे और पांडव के पुत्रों ने क्या किया? अतः संजय ने दूसरे श्लोक से तेरहवें श्लोक तक ‘धृतराष्ट्र पुत्रों ने क्या किया’- इसका उत्तर दिया। अब आगे के श्लोक से संजय ‘पांडु के पुत्रों ने क्या किया’- इसका उत्तर देते हैं।

ततः श्वेतैर्हयैर्युक्ते महति स्यन्दने स्थितौ ।
माधवः पाण्डवश्चैव दिव्यौ शंखो प्रदध्मतुः ।। 14 ।।

अर्थ- उसके बाद सफेद घोड़ों से युक्त महान रथ पर बैठे हुए लक्ष्मीपति भगवान श्रीकृष्ण और पांडुपुत्र अर्जुन ने दिव्य शंखों को बड़े जोर से बजाया।

व्याख्या- ‘ततः श्वेतैर्हयैर्युक्ते’- चित्र रथ गंधर्व ने अर्जुन को सौ दिव्य घोड़े दिए थे। इन घोड़ों में यह विशेषता थी की इनमें से युद्ध में कितने ही घोड़े क्यों न मारे जायँ, पर ये संख्या में सौ के सौ ही बने रहते थे, कम नहीं होते थे। ये पृथ्वी, स्वर्ग आदि सभी स्थानों में जा सकते थे। इन्हीं सौ घोड़ों में से सुंदर और सुशिक्षित चार सफेद घोड़े अर्जुन के रथ में जुते हुए थे।

महति स्यन्दने स्थितौ- यज्ञों में आहुति रूप से दिए गये घी को खाते-खाते अग्नि को अजीर्ण हो गया था। इसीलिए अग्निदेव खांडव वन की विलक्षण-विलक्षण जड़ी बूटियाँ खाकर अपना अजीर्ण दूर करना चाहते थे। परन्तु देवताओं के द्वारा खांडव वन की रक्षा की जाने के कारण अग्निदेव अपने कार्य में सफल नहीं हो पाते थे। वे जब-जब खांडववन को जलाते, तब-तब इंद्र वर्षा करके उसको बुझा देते। अंत में अर्जुन की सहायता से अग्नि ने उस पूरे वन को जलाकर अपना अजीर्ण दूर किया और प्रसन्न होकर अर्जुनको यह बहुत बड़ा रथ दिया। नौ बैलगाड़ियों में जितने अस्त्र-शस्त्र आ सकते हैं, उतने अस्त्र-शस्त्र इस रथ में पड़े रहते थे। यह सोने से मढ़ा हुआ और तेजोमय था। इसके पहिए बड़े ही दृढ़ एवं विशाल थे। इसकी ध्वजा बिजली के समान चमकती थी। यह ध्वजा एक योजन तक फहराया करती थी। इतनी लंबी होने पर भी इसमें न तो बोझ था, न यह कहीं रुकती थी और न कहीं वृक्ष आदि में अटकती ही थी। इस ध्वजा पर हनुमान जी विराजमान थे।

‘स्थितौ’ कहने का तात्पर्य है कि उस सुंदर और तेजोमय रथ पर साक्षात भगवान श्रीकृष्ण और उनके प्यारे भक्त अर्जुन के विराजमान होने से उस रथ की शोभा और तेज बहुत ज्यादा बढ़ गया था।

माधवः पांडवश्चैव- ‘मा’ नाम लक्ष्मी का है और ‘धव’ नाम पति का है। अतः ‘माधव’ नाम लक्ष्मीपति का है। यहाँ ‘पांडव’ नाम अर्जुन का है; क्योंकि अर्जुन सभी पांडवों में मुख्य है- ‘पांडवानां धनंज्यः’। अर्जुन ‘नर’ के और श्रीकृष्ण ‘नारायण’ के अवतार थे। महाभारत के प्रत्येक पर्व के आरंभ में नर और नारायण को नमस्कार किया गया है- ‘नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तम्म।’ इस दृष्टि से पांडव सेना में भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन- ये दोनों मुख्य थे। संजय ने भी गीता के अंत में कहा है कि ‘जहाँ योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण और गांडीव-धनुषधारी अर्जुन रहेंगे, वहीं पर श्री, विजय, विभूति और अटल नीति रहेगी’।

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शुक्रवार, 2 सितंबर 2016

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संबंध- पितामह भीष्म के द्वारा शंख बजाने का परिणाम क्या हुआ, इसको संजय आगे श्लोक में कहते हैं।

ततः शंखाश्च भेर्यश्च पणवानकगोमुखाः ।
सहसैवाभ्यहन्यन्त स शब्दस्तुमुलोऽभवत् ।। 13 ।।

अर्थ- उसके बाद शंख, भेरी, ढोल, मृदंग और नरसिंघे बाजे एक साथ बज उठे। उनका वह शब्द बड़ा भयंकर हुआ।


व्याख्या- ‘ततः शंखाश्च भेर्यश्च पणवानक गोमुखाः’- यद्यपि भीष्म जी ने युद्धारम्भ की घोषणा करने के लिए ही शंख बजाया था, तथापि कौरव सेना ने भीष्म जी के शंखवादन को युद्ध की घोषणा ही समझा। अतः भीष्म जी के शंख बजाने पर कौरव सेना के शंख आदि सब बाजे एक साथ बज उठे।

‘शंख’- समुद्र से उत्पन्न होते हैं। ये ठाकुर जी की सेवा-पूजा में रखे जाते हैं और आरती उतारने आदि के काम में आते हैं। मांगलिक कार्यों में तथा युद्ध के आरंभ में ये मुख से फूँद देकर बजाये जाते हैं। ‘भेरी’ नाम नगाड़ों का है ये नगाड़े लोहे के बने हुए और भैंस के चमड़े से मढ़े हुए होते हैं तथा लकड़ी के डंडे से बजाये जाते हैं। ये मंदिरों में एवं राजाओं के किलों में रखे जाते हैं। उत्सव और मांगलिक कार्यों में ये विशेषता से बजाये जाते है। राजाओं के यहाँ से रोज बजाए जाते हैं। ‘पणव’ नाम ढोल का है। ये लोहे के अथवा लकड़ी के बने हुए और बकरे के चमड़े से मढ़े हुए होते हैं तथा हाथ से या लकड़ी के डंडे से बजाये जाते हैं। ये आकार में ढोलकी की तरह होने पर भी ढोलकी से बड़े होते हैं। कार्य के आरंभ में पणवों को बजाना गणेश जी के पूजन के समान मांगलिक माना जाता है। ‘आनक’ नाम मृदंग का है। इनको पखावज भी कहते हैं। आकार में ये लकड़ी की बनायी हुई ढोलकी के समान होते हैं। ये मिट्टी के बने हुए और चमड़े से मढ़े हुए होते हैं तथा हाथ से बजाये जाते हैं। ‘गोमुख’ नाम नरसिंघे का है। ये आकार में साँप की तरह टेढ़े होते हैं और इनका मुख गाय की तरह होता है। ये मुख की फूँक से बजाये जाते हैं।

सहसैवाभ्यहन्यन्त- कौरव सेना में उत्साह बहुत था। इसलिए पितामह भीष्म का शंख बजते ही कौरव सेना के सब बाजे अनायास ही एक साथ बज उठे। उनके बजने में देरी नहीं हुई तथा उनको बजाने में परिश्रम भी नहीं हुआ। ‘स शब्दस्तुमुलोऽभवत्’- अलग-अलग विभागों में, टुकड़ियों में खड़ी हुई कौरव सेना के शंख आदि बाजों का शब्द बड़ा भयंकर हुआ अर्थात उनकी आवाज बड़ी जोर से गूँजती रही।

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गुरुवार, 1 सितंबर 2016

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तस्य संजनयन्हर्षं कुरुवृद्धः पितामहः ।
सिंहनादं विनद्योच्चैः शंखंदध्मौ प्रतापवान् ।। 12 ।।

अर्थ- दुर्योधन के हृदय में हर्ष उत्पन्न करते हुए कुरुवृद्ध प्रभावशाली पितामह भीष्म ने सिंह के समान गरजकर जोर से शंख बजाया।

व्याख्या- ‘तस्य संजनयन् हर्षम्’- यद्यपि दुर्योधन के हृदय में हर्ष होना शंखध्वनि का कार्य है और शंख ध्वनि कारण है, इसलिए यहाँ शंख ध्वनि का वर्णन पहले और हर्ष होने का वर्णन पीछे होने चाहिये अर्थात यहाँ ‘शंख बजाते हुए दुर्योधन को हर्षित किया’- ऐसा कहा जाना चाहिये। परंतु यहाँ ऐसा न कहकर यही कहा है कि ‘दुर्योधन को हर्षित करते हुए भीष्म जी ने शंख बजाया।’ कारण कि ऐसा कहकर संजय यह भाव प्रकट कर रहे हैं कि पितामह भीष्म की संखवादन क्रिया मात्र से दुर्योधन के हृदय में हर्ष उत्पन्न हो ही जाएगा। भीष्म जी के इस प्रभाव को द्योतन करने के लिए ही संजय आगे ‘प्रतापवान्’ विशेषण देते हैं।
कुरुवृद्धः- यद्यपि कुरुवंशियों में आयु की दृष्टि से भीष्म जी से भी अधिक वृद्ध बाह्लीक थे, तथापि कुरुवंशियों में जितने बड़े-बूढ़े थे, उन सब में भीष्म जी धर्म और ईश्वर को विशेषता से जानने वाले थे। अतः ज्ञानवृद्ध होने के कारण संजय भीष्म जी के लिए ‘कुरुवृद्धः’ विशेषण देते हैं। ‘प्रतापवान्’- भीष्मजी के त्याग का बड़ा प्रभाव था। वे कनक-कामिनी के त्यागी थे अर्थात उन्होंने राज्य भी स्वीकार नहीं किया और विवाह भी नहीं किया। भीष्मजी अस्त्र-शस्त्र को चलाने में बड़े निपुण थे और शास्त्र के भी बड़े जानकार थे। उनके इन दोनों गुणों का भी लोगों पर बड़ा प्रभाव था। जब अकेले भीष्म अपने भाई विचित्रवीर्य के लिए काशिराज की कन्याओं को स्वयंवर से हरकर ला रहे थे, तब वहाँ स्वयंवर के लिए इकट्ठे हुए सब क्षत्रिय उन पर टूट पड़े। परंतु अकेले भीष्म जी ने उन सबको हरा दिया। जिनसे भीष्म अस्त्र-शस्त्री की विद्या पढ़े थे, उन पर गुरु परशुराम जी के सामने भी उन्होंने अपनी हार स्वीकार नहीं की। इस प्रकार शास्त्र के विषय में उनका क्षत्रियों पर बड़ा प्रभाव था। जब भीष्म शर-शय्या पर सोये थे, तब भगवान श्रीकृष्ण ने धर्मराज से कहा कि ‘आपको धर्म के विषय में कोई शंका हो तो भीष्म जी से पूछ लें; क्योंकि शास्त्रज्ञान का सूर्य अस्ताचल को जा रहा है अर्थात भीष्म जी इस लोक से जा रहे हैं।’ इस प्रकार शास्त्र के विषय में उनका दूसरों पर बड़ा प्रभाव था।
पितामहः- इस पद का आशय यह मालूम देता है कि दुर्योधन के द्वारा चालाकी से कही गई बातों का द्रोणाचार्य ने कोई उत्तर नहीं दिया। उन्होंने यही समझा कि दुर्योधन चालाकी से मेरे को ठगना चाहता है, इसलिए वे चुप ही रहे। परंतु पितामह होने के नाते भीष्म जी को दुर्योधन की चालाकी में उसका बचपन दीखता है। अतः पितामह भीष्म द्रोणाचार्य समान चुप न रहकर वात्सल्यभाव के कारण दुर्योधन को हर्षित करते हुए शंख बजाते हैं। ‘सिंहनादं विनद्योच्चैः शंख दध्मौ’- जैसे सिंह के गर्जना करने पर हाथी आदि बड़े-बड़े पशु भी भयभीत हो जाते हैं, ऐसे ही गर्जना करने मात्र से सभी भयभीत हो जायँ और दुर्योधन प्रसन्न हो जाए- इसी भाव से भीष्म जी ने सिंह के समान गरजकर जोर से शंख बजाया।

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